Sunday, July 12, 2015

वे सीख कर आए थे हँसना सारा

अचानक मेरे मूँह पर दरवाज़ा बंद कर 
धकेल दिया गया था बाहर 
उनका हर अट्ठहास मुझे 
हिंसक अँधेरे में डुबोता था । 

हिंसक होना महीनों चुप भी कर सकता है 
और जब कहा गया कोई तमाशा नहीं 
क़सम 
नहीं होने दिया तमाशा कोई 
सारे तमाशे सिर में लिए फिरता हूँ । 

वे सीख कर आए थे हँसना सारा 
उसी दिन के लिए,
मैंने उस दिन सीखा कि 
मैं देख सकता था 
जाते हुए,
पर छू नहीं,
उसे ही ।

Sunday, June 28, 2015

मैं तुम्हें धोखा देना चाहता हूँ

मेरी आँखों से इतना क्यों गिरता है 
मीठा नहीं हुआ क्या अभी तक तुम्हारी आँख का पानी !

फिर करवट बदलो 
तुम्हारी पीठ पर लिख दूँ अपना नाम 
पलट कर तुम भर लो मेरी पीठ का मांस नाखूनों में । 

रात जैसे बनी हो भूलने के लिए 
यह भी कि कोई रात थी भी ऐसी सुक़ून भरी 
जब कम पड़ गई थी सारी आग 
और जिस्म से बहता था लावा 

होंठों से फूँकना साँसे रात भर एक दूसरे के सीने में 
और सुबह तक मर जाना 
प्यार हो तो इतना कि छोड़े भी ना और मारता भी जाए । 

दुर्दिनों में छोड़ जाए,
तड़पाए,
पर लौटो । 

जैसे बाढ़ उतरती है नदी में 
ऐसे उतरो मुझ में
कर जाओ सब तहस-नहस । 

जाड़ों की गुनगुनी धूप की तरह छूओ मेरे चेहरे को 
फैल जाए उजास 
ओस जैसे गिरो होंठों पर 
लौट आओ जैसे लौट आती हैं सर्दियाँ 
हर साल । 

लौट आओ 
मैं तुम्हें धोखा देना चाहता हूँ ।  



Sunday, June 07, 2015

बात तक करने को इंसान ना मिल पाने के अभाव में

मैं बिल्कुल नहीं कहना चाहता कि उनकी आँखें नहीं हैं 
पर यह सच है कि वो देख नहीं सकते 
और जो देख सकते हैं वो इतना देख चुके हैं कि हार कर 
अपनी नज़र की हत्या कर चुके हैं । 
ऐसा करना उनकी ख़ुद को ज़िंदा रख पाने की जद्दोज़हद है बस । 

और यक़ीन मानिए 
मैं जिन फेरों में फँसा हूँ 
खुद एक चक्रव्यूह हो गया हूँ 
जिसे मैंने रचा और फँसकर रह गया 
इसकी साँकलें तोड़कर जब मैं बाहर निकलूँगा 
तब ख़ुद भी भूल जाऊँगा अपने जैसों को और 
दंभ में कहूँगा कि हाँ मुझे कुछ नहीं दिखता 
मुझे अब चैन से जी लेने दो । 

यह जो एक दीवार मेरे माथे और 
मेरी आँखों में बन गई है 
जिससे मैं बाहर का कुछ देख नहीं पाता 
और अंदर पूरी एक इबारत लिखी है उलझे अतीत की 
कब तोड़ पाऊँगा इसे ऐसा खुद को कोसते 
मैं अपने इंतज़ार में हूँ । 

मैं अपने इंतज़ार में हूँ कि लौटूँगा 
तुम्हारे पास नहीं 
इस बार एक दफ़ा ख़ुद के पास । 

यह दीवार जिसका मैंने अभी ऊपर ज़िक्र किया 
जिसे मैं तोड़ना चाहता हूँ 
इस पर कभी किसी ने अपने हाथों से पोता था प्यार 
और जहाँ दीवार की आँख थी वहाँ चूमा था बारी-बारी 
पहले बायीं फिर दायीं या शायद ....
हाँ इसी क्रम में । 
जी हाँ दीवार की आँख थी जो बहती भी थी । 

रँग पपड़ी-पपड़ी कर के उतरता है 
मैं भी रोज़ कुरेदता हूँ 
नाख़ून दाँतों से ही चबाता हूँ 
बड़े हो नहीं पाते 
दीवार पर नया रँग पोतता हूँ 
काला । 

बचपन में आँगन में लगा अमरूद का पेड़ 
अमरूद कम और मधुमक्खी के छत्ते ज़्यादा उगाने लगाने था 
माफ़ कीजिए 
मधुमक्खी नहीं ततैया 
पीली-पीली । 

गले में फँस कर रह गया है नाम 
आँखों में धँस कर रह गया है चेहरा 
माथे में गढ़ गई हैं आँखें 
तुम्हारी । 
मेरी स्मृति पर ऐसा कब्ज़ा किया गया है 
जैसा दिल्ली पर कितनी बार किया था 
तुर्कों,अफ़ग़ानों और मुग़लों ने 
और छोड़ दिया था लुटा-पिटा । 

मेरी आँखें अभी हैं क्योंकि मैं भोग रहा हूँ 
कब तक रहेंगी पता नहीं 
पर एक अपील उन सबसे जो देख नहीं पा रहे !

बात तक करने को इंसान ना मिल पाने के अभाव में 
कई लोगों ने सीखा है 
ख़ुद से बातें करना,बड़बड़ाना और पागल हो जाना 
चिल्लाना,उदास रहना,हिंसक हो जाना 
दवाईयाँ गटक कर झेलना अवसाद 
या बस 
कूद जाना छतों से,खिड़कियों से, बालकनियों से । 

सबसे तेज़ चिल्ला वही रहा है जो घुट रहा है 
जो बहुत ज़्यादा सो रहा है वो उठ रहा है 
इन्हें भी ले जाइए अपनी रंगीनियों में 
घबराते है जो साँस के हर उतार-चढ़ाव के साथ । 

खोलिए ना आँखें !
अकेलापन मार रहा है कितनों को 
वे बच गए तभी बोल पाएँगे । 

मैं अपनी आँखें बचा रहा हूँ 
आप भी बचाइए ।  

Thursday, June 04, 2015

एक बहुत यातना वाले दिन

कैसा प्रेम था ?
विवशता !

पहले प्रेम में पड़ने की विवशता 
तुम्हारे कहने पर 
फिर उससे बाहर गिरने की 
तुम्हारे ही कहने पर । 

रात होती थी और 
रोज़ उनके सधे मानकों पर खरा उतरना होता था 
वे उकसाएँ और उन्माद में उन्हें नोच खाने के बजाय 
मन मसोस कर उनके भड़कते दिल की तासीर को 
समझदारी से ठंडा कर दूँ 
तो मेरी जीत 
बताया जाए किसी बहुत हँसी वाले दिन 
यह तो कसौटी थी 
तुम उत्तीर्ण हुए 
लायक हो प्रेम के । 

हम आज़माने के लिए थे 
छले गए अच्छे । 

दीवारों से लिपट कर रोते 
और चाटते कागज़ प्यार के 
खुरचते ज़मीन पर बिछी रंगीनियाँ । 

भर लाए हैं नाखूनों में 
रँग सारा 
रोज़ चबाते थोड़ा-थोड़ा कर के । 

तुम्हारे एक बार नकारने से चले आते 
चुप-चाप 
जैसा तय किया था 
एक बहुत यातना वाले दिन । 

Tuesday, May 26, 2015

हम खुद को बचाते हैं

वे सब 
जिनसे हम प्यार में है 
ग़लतफ़हमियों के शिक़ार होते जाते हैं 
एक-एक बात 
नुकीली कील-सी ठोकते हैं दिमाग़ में 
भरते जाते हैं अपनी कुंठाओं का नीला रँग 
उनके सीने में 
लिपटते हैं,फिर उन्हीं से बचते हैं 
फिर उन्हीं को नोचते हैं । 

कैसे-कैसे 
हम खुद को बचाते हैं । 

Thursday, May 21, 2015

किस किसका फ़ोन उठाते हैं आप ?

आपको तैयार रहना चाहिए ना 
हर किसी के स्वागत के लिए 
कि घंटी बजे और आप मुस्कुराएँ 
सब भूल कर साथ बैठें और पीएँ अदरक वाली चाय 
फिर चाहे 
वे सीधे छाती पर चढ़ आते हों 
माथे को लाल सन्न कर जाते हों 
कौन सी बात को क्या रूप दे कर 
किस तरह बताते हों । 

आप लोगों से मिलने में इतना क्यों घबराते हो । 

कहाँ आप सहज हो 
कहाँ से भाग जाना चाहते हो 
कहाँ आप सिर्फ़ सुनते हो 
कहाँ थोड़ा बोल भी पाते हो !

कितने पाले हैं आस्तीन में साँप ! 

किस किसका फ़ोन उठाते हैं आप ?

Monday, May 18, 2015

काश दिल नाखूनों में होता,रोज़ चबा लिया करता थोड़ा

फिर एक समय आता है 
जब आप माँग नहीं सकते 
दे भी नहीं पाते 
तब 
सिखाना पड़ता है खुद ही खुद को पालना 
लम्बी साँसें भर कर गले में उतारना पड़ता है सारा तेज़ाब 
फेँक देना होता है खुद को उदासी वाले किसी देश में 
कोई अपनी आँखें 
अपनी ममता ले कर 
नहीं पहुँच पाए जहाँ तक 
सीने से उठते सब शब्द सिर को हौले हौले करते हैं ज़ख्मी । 

काश दिल नाखूनों में होता,रोज़ चबा लिया करता थोड़ा । 

कितना चाहा होगा ना आपने कि साथ रहें 
जो चाहा वही तो नहीं मिला बस 
बाक़ी तो कितना हँसते हैं हम ।  

Saturday, May 09, 2015

एक अद्भुत रहस्य की तरह घटी तुम

सर्द होती संवेदनाओं के नाम 
इस शाम 
देता हूँ पैग़ाम 
कहीं बहुत दूर से आती 
कानों में पड़ती है एक हँसी 
किसकी !
क्या जानूँ ?
एक अद्भुत रहस्य की तरह घटी तुम । 

माज़ी की सारी परतें चीरते हुए 
तुम तक पहुँचने की कोशिश करता हूँ 
सफल।
ग़ायब होती जाती हो हर जगह से 
जबरन गिराई गई एक इमारत की तरह 
ध्वस्त होते हैं सब रास्ते 
जिन पर चले थे चार पैर साथ 
और उँगलियाँ गुँथे दो हाथ । 

बुझ चुकी लौ के नाम 
रौशनी बिन 
लौ और दीये 
दोनों का क्या दाम !

अब अँधेरा घिरता आता है यहाँ 
खिड़की में छिपे समुन्दर से 
जाओ !
तुम्हारे जाने का समय है । 



Tuesday, May 05, 2015

तू आग देती रहना

सन्नाटा चुभता है कानों में 
बालियाँ भी 

रात है अँधेरा यहाँ 
उजाला भी 

नल खुला है 
आवाज़ है 
डर गिरता है बाल्टी में 
पीता भी हूँ 
नहाता भी 

मेरी एक दुनिया है 
तुझसे भरी 
तुझसे फ़ना 

ठंडक है 
तू आग देती रहना । 

Friday, April 17, 2015

ख़ून बहता है माँ ! लिखने दे !

उसकी आँखों में बसा 
मेरे अक्स का आईना
टूटा जिस रात,
समुन्दर पार
मेरी आँख में किरकिरी सी मची 
मसला आँखों को तो लाल रँग गिरा सफ़ेद बेसिन पर 
एक आवाज़ ने बाँधे रखा मुझे सदियों तक । 

मैं लौटा तो सिर्फ़ 
लौटा दिए जाने के लिए 
मेरे इंतज़ार को उन्होंने साना अपनी 
उत्तेजक सिसकियों में । 

फिर जो सब तबाह हुआ तो सबने देखा और हँसे देर तक !

ख़ून बहता है माँ 
लिखने दे !

मैंने अपनी मृत्यु को कविताओं के ज़रिए मारा है ।  

Wednesday, April 15, 2015

पर जब वे हँसते हों किसी के रोने पर

नींद में मारे जाते कोड़े 
सोने से लगता डर 

कोयला मेरे गले में 
पर मैं काला नहीं 

कितने अच्छे लगते हैं ना 
हँसते हुए लोग 
पर जब वे हँसते हों किसी के रोने पर !

मोम पिघलता कानों में 
आवाज़ की खनक बढ़ती जाती 

सब रास्ते बंद करके कहा जाता 
वापस लौटो । 

दिमाग़ में घूमता सारा ब्रह्माण्ड 
मेरे ब्रह्माण्ड में एक ही इंसान 

जब आप मेरा नाम पुकार रहे होता हैं 
मैं वहाँ होता ही नहीं 
जूझते हम सपने में 
बचाता कोई । 

यह पागलपन उन्होंने ही दिया 
जो बाद में पूछते पागल क्यों ?


Sunday, April 12, 2015

फिर कभी नहीं लौटे

हॉफलौंग की पहाड़ियाँ हमेशा याद रहेंगी मुझे । 

वॉलन्टरी रिटायरमेंट ले कर कोई लौटता है घर 
बीच में रास्ता खा जाता है उसे । 
दुःख ख़बर बन कर आता है 
एक पूरी रात बीतती है छटपटाते 
सुध-बुध बटोरते । 

अनगिनत रास्ते लील गए हैं सैकड़ों जानें । 

एक-दूसरे से अपना दुःख कभी ना कह सकने वाले अपने 
कैसे रो पाते होंगे फूट-फूट कर । 

असम में लोग ख़ुश नहीं है,
बहुत सारी प्रजातियाँ अपनी आज़ादी के लिए लड़ रहीं हैं 
उनके लिए कोई और रास्ता नहीं छोड़ा गया है शायद । 
हथियार उठाना मजबूरी ही होती है यक़ीन मानिए 
कोई मौत लपेट कर चलने को यूँ ही तैयार नहीं हो जाता । 

आप देश की बात करते हैं,
युद्ध की बात करते हैं,
देश तो लोग ही हैं ना !
उनके मरने से कैसे बचता है देश ?

बॉर्डर पर,कश्मीर में,बंगाल में,छतीसगढ़ में,उड़ीसा में,असम में 
मरते हैं पिता,
उजड़ते हैं घर,
बचते हैं देश । 

अख़बारों में कितनी ग़लत ख़बरें छपती हैं,यह तभी समझ आया । 

सामान लौटता है !
गोलियों से छिदा हुआ खाने का टिफ़िन,
रुका हुआ समय दिखाती एक दीवार घड़ी,
बचपन से खबरें सुनाता रेडियो,
खरोंचों वाली कलाई-घड़ी,
ख़ून में भीगी मिठाईयाँ,
लाल हो चुके नोट,
वीरता के तमगे 
और धोखा देती स्मृति । 

कितनी बार आप लौट आए 
वो मेरी नींद होती थी या सपना या कुछ और 
जब चौखट बजती थी और आप टूटी-फूटी हालत में आते थे 
फिर कुछ दिन में चंगे हो जाते थे 
ऐसा मैंने कुछ सालों तक देखा 
अब वो साल तक नहीं लौटते । 

हर बार सोचा कि 
इस बार जब आप आएँगे सपने में 
तो दबोच लूँगा आपको 
सुबह उठकर सबको बोलूँगा कि देखो 
लौट आए पापा 
मैं ले आया हूँ इन्हें उस दुनिया से 
जहाँ का सब दावा करते हैं कि नहीं लौटता कोई वहाँ से,
ऐसी सोची गई हर सुबह मिथ्या साबित हुई । 

काश फिर आए ऐसा कोई सपना 
फिर मिल पाए वही ऊर्जा 
एक घर को 
जो पिता के होने से होती है । 

हे ईश्वर ! 
कोई कैसे यह समझ पैदा करे कि बिना झिझके सीख पाए कहना 
"पिता नहीं है" । 

और कितनी भी क़समें खाते जाएँ हम 
कि नहीं आने देंगे किसी भी और का ज़िक़्र यहाँ 
पर एक समय था,एक शहर था बुद्ध का,एक साथ था, 
फल्गु नदी बहती थी,
विष्णुपद मंदिर में पूर्वजों को दिलाई जाती थी मुक्ति । 
हम यहाँ दोबारा आएँगे और करेंगे पिण्ड-दान 
ऐसा कहती,भविष्य की योजनाएँ बनाती एक लड़की 
जा बैठी है अतीत में कहीं । 

आख़िरी स्मृतियों में बचती है रेल,
प्लेटफॉर्म पर हाथ हिलाते हुए पीछे छूट जाना । 
उस आख़िरी साथ में पहली बार उन्होंने बताए थे अपने सपने । 

सात साल पहले इसी दिन वे लौटे 
हमने उन्हें जला दिया । 
फिर कभी नहीं लौटे 
पिता । 






Friday, April 10, 2015

मैं उम्मीदों के आँसू उछालता हूँ और.........

शाम के सात बजे हैं । मैं अभी सो कर उठा हूँ । मुझे याद है,जब मुझे नींद आ रही थी तब मैं परेशान था । डरियेगा मत । आत्महत्या वाला परेशान नहीं । अभी सो कर उठा हूँ तो लगता है जैसे किसी भूलभुलैया में हूँ । उठता हूँ तो कभी लगता है बचपन में उठा हूँ,कभी घर में और कभी दिल्ली में । उठते ही बदहवास-सा जाने क्या खोजता हूँ । घर की चौथी मंज़िल से मुंबई शहर डरावना दिख रहा है । मैं अगर ख़ुश होता तो लिखता कि घर की चौथी मंज़िल से मुंबई शहर बहुत ख़ूबसूरत दिख रहा है । पर मैं दुखी तो नहीं हूँ । 

                                             दूर-दूर तक लाल-पीली रोशनियाँ दिखाई दे रहीं हैं । बंद खिड़की से बाहर दिखती गाड़ियाँ  बिना आवाज़ के सरपट दौड़ रही हैं । रोशनी से याद आया जिसे मैं अपने जीवन की रोशनी समझता था वह पिछले साल इन्हीं दिनों मुझसे किनारा कर गई । नीचे छोटे बच्चे खेल रहे हैं । कुछ लोग बातें कर रहे हैं और खूब हँस रहे हैं । एक लम्बी सड़क दिखती है जिस पर गाड़ियाँ दौड़ रही हैं । सब इधर-उधर भागे जा रहे हैं । कोलाहल-सा है । मैं ठीक-ठीक अंदाज़ा नहीं लगा पा रहा हूँ कि मुझे क्या दुःख है । मायूसी क्यों बैठी जा रही है अंदर । देखा जाए तो अपने देश के पिचयान्वे प्रतिशत लोगों से अच्छा जीवन बिता रहा हूँ । 

                                                                               यह शहर पागलों का शहर लगता है । सब को बहुत जल्दी अमीर बनना है,मशहूर होना है। बुलबुले सा शहर है जैसे अभी सब होश में आ जाएँगे और बहुत रोएँगे कि क्या कर रहे हैं अपनी ज़िन्दगी के साथ । गुब्बारे से इस शहर में कोई हल्के से सुई चुभा दे या कोई ग़ुस्से में हो तो फोड़ ही दे । जैसे एक भले दिन सब फूट जाएगा और असली,नया और धुला हुआ शहर बाहर आएगा । 

                                                                  बेपरवाही सारी गुम हो गई है । जब नकली बन कर मिलता हूँ तो सब पसंद करते हैं ।जब बिलकुल खुद जैसा होता हूँ तो कोई पूछता तक नहीं । ऐसे ही तो,लोग आपको नकली बनने पर मजबूर करते हैं और नकली लोगों के लिए,नकली ख़ुशी की तलाश में हम नकली होते चले जाते हैं । 

                                  वह जब से छोड़ कर गई है,किसी के भी क़रीब जाने में डर लगता है । अपनी परेशानियों का बोझ किसी और पर क्यों लादा जाए ।क्यों अपना अँधेरा किसी के दिमाग़ में भरूँ । अपने बारे में बात करने को वैसे भी कोई नहीं मिलता । मैं उम्मीदों के आँसू उछालता हूँ और थोड़ा और मायूस होता जाता हूँ । 

                     नींद में काँटे उग आए हैं । अभी सोते समय एक दोस्त का फ़ोन आया था,मैं फ़ोन साइलेंट पर कर के फिर सो गया । मुझे और पैसे कमाने हैं । कुछ अच्छा पढ़ने को मिलता ही नहीं । पता नहीं लोग क्या-क्या लिख रहे हैं । बाहर कितनी अच्छी फ़िल्में बनती हैं । यहाँ तो कोई अच्छा काम करने की कोशिश भी करता है तो आस पास वाले ही टाँग खींचने में लगे रहते हैं । 

गुरमीत राम रहीम सिंह के गाने आते हैं,फिल्म आती है । आनंद पटवर्धन जीवन भर फ़िल्में बनाते हैं और कितने लोग जानते हैं । अपराधियों को चुन कर संसद भेज दिया जाता है । वह कैसे लोग होंगे जिन्हें हिंसा से सुक़ून मिलता है। वो कैसी पढ़ी-लिखी नौकरी करती लड़कियाँ होंगी जो शादी के बाद अपना नाम बदल लेती हैं । मेरा तो बचपन से एक नाम है और मैं तो उसे किसी के लिए ना बदलूँ । मुझे कब से गिटार सीखना है । कितना काहिल हूँ मैं । दिल्ली जाने का मन भी करता है और डरता भी हूँ । उससे सामना कभी हुआ तो क्या होगा । जिसके थोड़ा क़रीब जाता हूँ उसी के प्रति मन में कटुता आ जाती है । मैं और लोगों को नहीं जानना चाहता । सब दूर से ही अच्छे लगते हैं । इतना सारा काम रहता है करने को,मैं सोता क्यों हूँ । 

                                    सब कुछ फिसलता हुआ सा लगता है । कितना मन करता है किसी से बात करने का । यहाँ समुन्दर है । मेरे कभी काम नहीं आया । मैं इंतज़ार ही करता रह गया । माँ के साथ वक़्त बिताना है । भतीजों को बड़ा होते देखना है । कितना कुछ सीखना है । बहुत समय ख़राब किया मैंने । लोगों में करुणा ख़त्म होती जा रही है । दूसरोँ के जीवन में होने वाले तमाशे हमें सुख देते हैं । मुझे रात में ठीक समय पर सोना शुरू करना है । सारा दुःख अपनों से ही मिलता है । पुरुषों के अंदर इतना ग़ुस्सा क्यों भरा है । जिनके सुर नहीं लगते,उनके गाने आते हैं और हिट हो जाते हैं । मैंने बहुत पहले इस दुनिया के बनाए मानकों पर खरा उतरना छोड़ दिया है । किसी भी संस्था में पाँच लोग बैठ कर बच्चों का भविष्य तय कर रहे  होते हैं ।   

                                                                कुछ नया बनाने के लिए पुराना सब तोड़ना पड़ता है या कहूँ छोड़ना पड़ता है । पर पुराना छूटे ही नहीं तो । जब ग़ुस्सा आए तो क्या करना चाहिए । आप जिनको जितना महत्व देते हैं,उनके लिए आप उतने ज़रूरी ना रह जाएँ तो क्या करना चाहिए । 

                                                                                              रात में कभी भी नींद खुलती है तो खिड़की से, अँधेरे में दूर तक दुःख साफ़ नज़र आता है । बेचैनी होती है । पीछे ही रह गया सब ।घर,माँ,पिता,दिल्ली,प्यार । मैं कहाँ आगे जा रहा हूँ । कितना कुछ बस छूटता जाता है । पीछे मुड़ कर देखूँ तो सारे पुल ख़ुद ही तो ध्वस्त किए हैं ।जब उनके सामने हँस रहा होता हूँ,तब आँखों में रखे काँटे और अंदर तक धँसते हैं। वे कहते हैं ख़ुद को मार कर क्यों जीते हो । 

यह शहर ऐसा क्या देगा हमें जो हम सब कुछ छोड़ कर पागल हुए पड़े हैं ।  
              

Wednesday, April 08, 2015

यहाँ रख छोड़ा है मैंने तुम्हें

मिट्टी,
पानी,
आकाश,
रौशनी का गोला,
मेरी दृष्टि 
और साँझ । 

तुम्हें पता है ?
यहाँ रख छोड़ा है मैंने तुम्हें 
यहीं मिलता हूँ रोज़ तुमसे । 
कोई बताए !

बहुत दूर जाना पड़ता है तुमसे मिलने 
इसी में सारा दिन मेरा निकला जाता है । 

और 
यह गोला पानी में डूबकर 
दूसरी दुनिया में चला जाता है 
जैसे तुम चली गई हो 
दूसरी दुनिया में 
सारी रौशनी ले कर । 

मेरी आँखों को अँधेरा नहीं सुहाता । 

Saturday, March 14, 2015

कोई आवाज़ लगाता है मुझे

तुम 
जो अंतर्मन में बैठी हो 
तुमसे 
मैं फुसफुसाकर पूछता हूँ 
मैं जाऊँ ?
यथार्थ का बोध है मुझे पर 
तुम्हारे लौटने की आस का कोई अंत नहीं जान 

तुम 
अंतर्मन में जहाँ बैठी हो 
वहाँ से 
तुम्हारा मौन और 
तुम्हारे उस मौन में गढ़ी तुम्हारी आँखें 
बेड़ियों में क़स देती हैं मेरे दिल को 

कोई आवाज़ लगाता है मुझे !
अपना चेहरा ले कर सामने खड़ी हो जाती हो 
हटो !
हटो भी !
मुझे इन आँखों में कोई और चेहरा बसाना है ।  

Wednesday, March 11, 2015

वहाँ से यहाँ किसी ने प्यार नहीं भेजा

कोई सदियों पुरानी बात तो नहीं 
जब तुम अपनी नन्ही उँगलियों में भरा 
ख़ालीपन,
निराशा,
ग़ुस्सा,
डर,
आँसूं,
पीड़ा,
प्यार,
पन्नों पर उड़ेल कर 
उन्हें ख़त बनाती थी और 
दिल्ली की सडकों पर 
जगह-जगह मूक खड़े 
लाल डब्बों में छोड़ आती थी । 

डाकिया परेशान होगा 
वहाँ से यहाँ किसी ने प्यार नहीं भेजा 
बहुत समय बीता । 

Tuesday, March 03, 2015

दिल्ली तब मेरे साथ इतनी नहीं थी,जब मैं दिल्ली मैं था

लगता है सब साज़िशें ही हैं । छह घंटे एक मुशायरे को सुनना जैसे फिर से तुम से हो कर गुज़रना । जैसे कोई कुछ भी सुनाए,सब कुछ ठहरता एक ही जगह जा कर था । इतना क्या कम था कि रवीश जी की लिखी लप्रेक से भी गुज़रना हो गया । जैसे यह इसी लिए लिखी गई हो कि मुझे वापस लौटाया जा सके उसी दिल्ली में । शुरू करते ही लगा कि मण्डी हॉउस और वहाँ की किसी कहानी का कोई ज़िक्र होगा या नहीं । एक बार तो बात बाराखंबा तक पहुँची(तब कुछ अटका मन में)लेकिन उसके आगे नहीं ।सच कहता हूँ,यह सब साज़िशें ही हैं कि मुझे बार-बार तुम तक पहुँचाया जाए । पर किताब में शहर के बहुत से हिस्से मैं खोजता ही रह गया । मिले ही नहीं । मेरे लिए शहर में इश्क़ था या इश्क़ में शहर,पता नहीं । 

                                                                  ना शाम को रोज़ हौज़ ख़ास लौटती एक लड़की का डर था,ना तय समय सीमा में बंधी एक लड़की से प्यार में पड़े एक लड़के के धैर्य,ग़ुस्से और घुटन की बातें । ना इंडिया हैबिटेट सेंटर वाली शुरुआत,ना प्रगति मैदान का इक़रार और ना मण्डी हॉउस का प्यार । ना अक्षरधाम मेट्रो का इंतज़ार और ना मयूर विहार के आवारा रास्ते । ना बंगाली मार्केट का मीठा पान और ना जनपथ के स्वेटर । ना सेंट्रल सेक्रेटेरिएट मेट्रो की दीवारें खुरचना,ना कोई नाटक,ना ग्रीन रूम,ना स्टेज । ना ही भविष्यों को अलग करती निजामुद्दीन स्टेशन से निकलती ट्रेन । शहर में एक कोना होना,उसका उजड़ना और शहर का उजड़ जाना । 

                  और एक जगह जहाँ पहुँच कर सब ख़त्म हो गया था,जिसका ज़िक्र करने से मैं आज भी बच कर निकल गया । दिल्ली में डर होना और अब डर में दिल्ली होना । 

                                   दिल्ली तब मेरे साथ इतनी नहीं थी,जब मैं दिल्ली मैं था ।  

Monday, March 02, 2015

और बचपन की सारी समझदारी तुम भूलोगे

छह साल का एक बच्चा 
क्या हो सकता है दार्शनिकों की तरह उदास और गुमसुम ?
बचपन में ही कोई हो जाता है अंतर्मुखी 
कुरेदना पड़ता है उसे। 

पूछने पर ग़ुस्से और घुटन के मिश्रित भाव ले कर 
बताता है,
"भगवान कहीं नहीं होते 
कभी नहीं आते मदद करने 
जब मैं होमवर्क करता हूँ और अटक जाता हूँ तब भी नहीं आते 
बाहर लड़ाई होती है जब तब भी नहीं आते 
स्कूल में टीचर,घर में पापा-मम्मी डाँटते हैं तब भी नहीं आते 
सुनते भी नहीं कुछ 
सब झूठ कहते हैं,नहीं होते भगवान । "

मैं तड़प कर गले लगाता हूँ उसे 
इतनी सी उम्र में,इतनी सी बातों में 
तुमने जान लिया है सच,
लेकिन 
जीवन भर तुम्हें इसका विपरीत सिखाया जाएगा 
और बचपन की सारी समझदारी तुम भूलोगे 
स्कूल में रट्टा मारते हुए । 

मैं चाहता हूँ 
तुम कंचे खेलो,गिल्ली-डंडा भी,वीडियो-गेम्स भी 
मिट्टी में लोटो,बारिश में भीगो 
और गंदे कपड़ों में घर लौटो 
नाचो,गाओ,
रसोई में खाना बनाओ,
माँ के बालों की चोटी करना सीखो,
सीखो स्वेटर बुनना,
लड़कियों के साथ बिताओ खूब सारा समय 
जवाब दो हर बात का जो लगे ग़लत 
चाहे असंभव से लगे,
नन्ही आँखों में भरो जितने भर सकते हो सपने 
बचाओ उन्हें बड़े होने तक । 

सोचो हर डर के पार 
स्कूल,फिर कॉलेज,फिर नौकरी,
फिर शादी,फिर बच्चे,
यह सब दरअसल डर हैं 
कि इस ढाँचे के बिना कैसे चलेगी ज़िंदगी 
तुम तोड़ना ऐसे ढाँचों को 

बड़े होते-होते 
तुम्हें बहुत रोका जाने वाला है 
तुम रुकना मत ।  

Saturday, February 28, 2015

देर तक मेरा फड़फड़ाना ज़िंदा रहे

मैं उड़ना सीखूंगा जब 
तुम मेरे पंखों को बाँध देना । 

जैसे लड़खड़ाता था तुम्हारे पास आते आते 
तुमसे दूर जाते हुए भी वैसे ही लड़खड़ाता हूँ 
और मेरी चलने की चाह ख़त्म होती जाती है ।  

किसी युद्ध में जैसे एक छोटा सा बच्चा 
अपनी जान बचाने को बदहवास दौड़ता रहे 
और छुपने की जगह मिलने पर 
बैठ कर रो पाए चैन से 
ऐसे 
गोद नसीब हो तुम्हारी 
बच्चे को मार जाए गोली कोई । 

और जब मैं मासूम कबूतर हो जाऊँ 
तुम्हारे घर की खिड़की के एक कोने में 
बनाऊँ एक घर । 

मेरी उड़ने की मंशा और बंधे पंखों के बीच 
देर तक मेरा फड़फड़ाना ज़िंदा रहे । 


Saturday, February 21, 2015

अकेले छूट जाने का डर एक रोग की तरह था तब

एक स्त्री रहती थी 
दिलाती रहती विश्वास निरंतर 
कि रहेगी हमेशा 
अकेले छूट जाने का डर एक रोग की तरह था तब 
रोज़ घुलता बूँद-बूँद नसों में । 

कमाल की बात है जी !

अकेला छूट चुका हूँ 
कोई डर नहीं अब ऐसा 
सब जकड़ती जाती ज़ंजीरें हौले-हौले 
गल गईं जैसे ख़ुद ही 
बहते द्रव्य में कितना स्पष्ट है चेहरा तुम्हारा । 

नहीं होने में कितना सारा होना छुपा है ।