Sunday, July 12, 2015

वे सीख कर आए थे हँसना सारा

अचानक मेरे मूँह पर दरवाज़ा बंद कर 
धकेल दिया गया था बाहर 
उनका हर अट्ठहास मुझे 
हिंसक अँधेरे में डुबोता था । 

हिंसक होना महीनों चुप भी कर सकता है 
और जब कहा गया कोई तमाशा नहीं 
क़सम 
नहीं होने दिया तमाशा कोई 
सारे तमाशे सिर में लिए फिरता हूँ । 

वे सीख कर आए थे हँसना सारा 
उसी दिन के लिए,
मैंने उस दिन सीखा कि 
मैं देख सकता था 
जाते हुए,
पर छू नहीं,
उसे ही ।