Saturday, May 17, 2014

एक युग तो बीत गया

जब भरोसे जैसे शब्दों की
अहमियत बची होगी
छल-कपट जैसे शब्दों के भी
कुछ मायने होंगे
किसी और सदी में
सतयुग से भी सच्चे  
किसी और युग में
हम करेंगे प्रेम ।


इसी तरह
हम कुछ महीनों के अंतर
में जन्म लेंगे
मैं बचपन से होऊंगा तुम्हारे साथ
तुम्हें समझने के लिए
मैं मान जाया करूँगा तुम्हारे
एक बार मनाने से
तुम्हें भी मौका मिलेगा
रूठ जाने का
जब मैं करने लगूंगा कुछ काम
और तुम डरना छोड़ दोगी
हम करेंगे प्रेम ।


जब हम पी पाएँगे
एक दूसरे की पीड़ा
लिपट सकेंगे
जब मन चाहे
शहर और काम
नहीं कर पाएंगे हमें दूर
जब खुली सडकों पर
बेबाकी से घूम पाएंगे

कर पाएंगे अपने नामों के
मतलब को सार्थक
हम करेंगे प्रेम ।
जब तुम निभा चुकी होगी
सारी ज़िम्मेदारियाँ
और मैं बिता चुका होऊँगा
एक पूरा एकांत भरा जीवन
हम जानेंगे
साथ रहना कैसा होता है
मुझमे होगी इतनी समझ
कि मैं रहूँगा आस-पास
तुम्हें चले जाने से बचाने के लिए  
नहीं लिखनी पड़ेंगी
मुझे रोते हुए कविताएं
हम करेंगे प्रेम ।


कि एक युग तो बीत गया
तुम्हारे मेरे प्रेम का ।  

Wednesday, May 14, 2014

खुद ग़ैर हूँ ,आज खुद से बचाता हूँ


कभी तुझ को बचाता हूँ,कभी खुद को बचाता हूँ
        जाने कैसे मैँ मेरे अंदर इश्क़ की लौ बचाता हूँ

        मुद्दतों से लुटता ही आया है तेरा शहर
        मैं तो मेरी ढाई साल की दिल्ली बचाता हूँ

        हलक़ पे अटका रहे नाम,ज़ुबाँ पे न आएगा  
        जा मैं तुझे बेवफ़ाई के असर से बचाता हूँ

        तेरी हँसती आँखों ने जान रूलाया है बहुत
        मैं फिर भी तुझे मेरी दुआओं में बचाता हूँ
        
        तुझे ग़ैरों से बचाना फ़र्ज़ था मेरा  
        खुद ग़ैर हूँ ,आज खुद से बचाता हूँ
        

Tuesday, May 13, 2014

मेरे नाम के साथ तुम उन्हें कैसे ले कर जाती

“प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ”
           तुम्हारी लिखाई में अंकित
           तुम्हारा नाम और पुस्तक मेला 2012
           तुम्हारा नाम भी वो जो उस समय
           तुम खुद को मुझ से जोड़ कर सोचा
           और लिखा करती थीं
           ऐसी बहुत किताबें हैं मेरे पास
           जो मैं छुपा देना चाहता हूँ


           कितना ज़रूरी होता है ना छुपाना
           हमसे बेहतर कौन जानेगा
           मैं कभी उन किताबों पर अपना नाम
           नहीं लिख पाया जो मैंने तुम्हे दीं
           मेरे नाम के साथ तुम उन्हें कैसे ले कर जाती
           घर
           हमें छुपाना था ना


          तस्लीमा नसरीन की “दुखियारी लड़की”
          देते हुए फ़ेमिनिज़्म के बारे में कहा था तुमने
         वो मैने अभी तक नहीं पढ़ी
         उस दुखियारी लड़की में अब तुम दिखोगी क्या ?
         
          हम
         अनाथ प्रेमी थे
         लाचार समय में


         प्रेम को छुपाना क्यों पड़ता है
         ख़ैर,
         तुम्हारी लिखाई बहुत अच्छी है |


वह सारे बोध जो तुम्हे हुए

तुमने मारा नहीं है मुझे
   जन्म दिया है
   हर बार
   जब लगा मुझे
   और लगवाया मैंने तुम्हें
   कि मार रही हो तुम
   यही है इकलौता सच
   वह सारे बोध जो तुम्हे हुए
   मुझे होने थे
   तुमने बोया प्यार
   मैंने डर

जब तुम्हारा समाज हिम्मत जुटा लेगा

जो जानवर हो गया है
   या चुप बंद कमरे में
   डर कर सो गया है
   उसके पीछे एक कहानी है
   जब तुम्हारा समाज हिम्मत जुटा लेगा
   इन कहानियों को सुनने की
   तब
   बंद हो जाएँगी हत्याएँ
   बंद हो जाएँगी

   आत्महत्याएँ ।

साथ

हमें तब तक हंसना था जब तक
   ज़बरदस्ती कोशिश करने कर भी
   हँसी ख़त्म हो चुकी होती
   हमें तब तक रोना था जब तक
   आँखों में आँसू और गले का रूँधना
   ख़त्म हो चुका होता
   इतना तो होना था
 
साथ  |

तुम मुझे यूं मार कर गिरा दोगी

और मुझे एकदम से याद आया
   जबकि मैं कुछ सोचना नहीं चाह रहा था
   मैं अब कुछ सोचना नहीं चाहता
   कि मेरे पास मेरे बचपन की एक ही फ़ोटो थी
   और मैं उसमें ऐसा सीधा दिखता था कि
   तुम मुझे यूं मार कर गिरा दोगी
   तुम अपनी बचपन की फ़ोटो में भी
   बहुत चंट दिखती थीं
   मार कर गिरा देने वाली बात
   तुमने ही तो कही थी
   इस बात पर हम कुछ देर हँसते रहे थे
   मुझे वह दोनों फ़ोटो याद आती हैं
   और एक पर्स भी  
   अब मैं कुछ सोचना नहीं चाहता
   लेकिन तब
   मैं अपने और तुम्हारे बचपन में लौट जाना चाहता था
   तुम्हारे साथ बड़ा होना चाहता था
   उस घर जाना चाहता था
   जहां तुम बार बार अकेली चली जाती हो
   तुम्हारे साथ स्कूल जाना चाहता था
   पैदल चलते हुए आगे निकल कर,रुक कर,पीछे मुड़ कर
   तुम्हारा इंतज़ार करना चाहता था

   तुम्हें तो याद होंगे वह रास्ते
   मैंने तो कभी देखे ही नहीं
   तुम्हें अपने घर ले जाना चाहता था
   जिधर जाने वाली ट्रेन में तुम मुझे छोड़ने स्टेशन तक आती थी
   हम दोनों दूर तक पटरियों पर नज़र दौड़ाते थे
   मुझे दिखता था मेरा घर
   तुम्हें मेरा बीता हुआ समय

  कितना समय निकल गया था
  जो हमने साथ नहीं बिताया था
  कितना समय आना बाकी है
  जो हमें साथ बिताना था  
  वो फोटोज़ बड़ी हो गयीं हैं
  बूढ़ी भी तो होंगी
  पर अब उनकी कोई बात नहीं होती |

छोटी सी ही तो बात है


तूने कलाईयों के कंगन बदले हैं शायद
     आँखों का काजल पोंछा है शायद
     या आँखें ही बदल ली होंगीं
     तूने तारीखें बदली हैँ  
     कानों में पड़ने वाली आवाज़ बदली है
     बिस्तर की वो सिलवटें बदली हैं
     या वो चादरें फूँक दी होँगी
     
     बहुत शौक है न तुझे
     सिरे से नकार देने का
     प्रेम को
     तीन वर्षों को
     फाड़ कर फ़ेंक देने का उन तोहफों को
     जिनको कभी सीने से लगाये फिरती थी
     और नाज़ करती थी प्रेम पर
     सिर्फ लगाव भर नहीं था
     घरेलू संस्कार ?
     
     …………
     चुभने वाला सच कहूँ ?
     छोटी सी ही तो बात है
     तूने लड़का बदल लिया है ।