Friday, April 17, 2015

ख़ून बहता है माँ ! लिखने दे !

उसकी आँखों में बसा 
मेरे अक्स का आईना
टूटा जिस रात,
समुन्दर पार
मेरी आँख में किरकिरी सी मची 
मसला आँखों को तो लाल रँग गिरा सफ़ेद बेसिन पर 
एक आवाज़ ने बाँधे रखा मुझे सदियों तक । 

मैं लौटा तो सिर्फ़ 
लौटा दिए जाने के लिए 
मेरे इंतज़ार को उन्होंने साना अपनी 
उत्तेजक सिसकियों में । 

फिर जो सब तबाह हुआ तो सबने देखा और हँसे देर तक !

ख़ून बहता है माँ 
लिखने दे !

मैंने अपनी मृत्यु को कविताओं के ज़रिए मारा है ।  

Wednesday, April 15, 2015

पर जब वे हँसते हों किसी के रोने पर

नींद में मारे जाते कोड़े 
सोने से लगता डर 

कोयला मेरे गले में 
पर मैं काला नहीं 

कितने अच्छे लगते हैं ना 
हँसते हुए लोग 
पर जब वे हँसते हों किसी के रोने पर !

मोम पिघलता कानों में 
आवाज़ की खनक बढ़ती जाती 

सब रास्ते बंद करके कहा जाता 
वापस लौटो । 

दिमाग़ में घूमता सारा ब्रह्माण्ड 
मेरे ब्रह्माण्ड में एक ही इंसान 

जब आप मेरा नाम पुकार रहे होता हैं 
मैं वहाँ होता ही नहीं 
जूझते हम सपने में 
बचाता कोई । 

यह पागलपन उन्होंने ही दिया 
जो बाद में पूछते पागल क्यों ?


Sunday, April 12, 2015

फिर कभी नहीं लौटे

हॉफलौंग की पहाड़ियाँ हमेशा याद रहेंगी मुझे । 

वॉलन्टरी रिटायरमेंट ले कर कोई लौटता है घर 
बीच में रास्ता खा जाता है उसे । 
दुःख ख़बर बन कर आता है 
एक पूरी रात बीतती है छटपटाते 
सुध-बुध बटोरते । 

अनगिनत रास्ते लील गए हैं सैकड़ों जानें । 

एक-दूसरे से अपना दुःख कभी ना कह सकने वाले अपने 
कैसे रो पाते होंगे फूट-फूट कर । 

असम में लोग ख़ुश नहीं है,
बहुत सारी प्रजातियाँ अपनी आज़ादी के लिए लड़ रहीं हैं 
उनके लिए कोई और रास्ता नहीं छोड़ा गया है शायद । 
हथियार उठाना मजबूरी ही होती है यक़ीन मानिए 
कोई मौत लपेट कर चलने को यूँ ही तैयार नहीं हो जाता । 

आप देश की बात करते हैं,
युद्ध की बात करते हैं,
देश तो लोग ही हैं ना !
उनके मरने से कैसे बचता है देश ?

बॉर्डर पर,कश्मीर में,बंगाल में,छतीसगढ़ में,उड़ीसा में,असम में 
मरते हैं पिता,
उजड़ते हैं घर,
बचते हैं देश । 

अख़बारों में कितनी ग़लत ख़बरें छपती हैं,यह तभी समझ आया । 

सामान लौटता है !
गोलियों से छिदा हुआ खाने का टिफ़िन,
रुका हुआ समय दिखाती एक दीवार घड़ी,
बचपन से खबरें सुनाता रेडियो,
खरोंचों वाली कलाई-घड़ी,
ख़ून में भीगी मिठाईयाँ,
लाल हो चुके नोट,
वीरता के तमगे 
और धोखा देती स्मृति । 

कितनी बार आप लौट आए 
वो मेरी नींद होती थी या सपना या कुछ और 
जब चौखट बजती थी और आप टूटी-फूटी हालत में आते थे 
फिर कुछ दिन में चंगे हो जाते थे 
ऐसा मैंने कुछ सालों तक देखा 
अब वो साल तक नहीं लौटते । 

हर बार सोचा कि 
इस बार जब आप आएँगे सपने में 
तो दबोच लूँगा आपको 
सुबह उठकर सबको बोलूँगा कि देखो 
लौट आए पापा 
मैं ले आया हूँ इन्हें उस दुनिया से 
जहाँ का सब दावा करते हैं कि नहीं लौटता कोई वहाँ से,
ऐसी सोची गई हर सुबह मिथ्या साबित हुई । 

काश फिर आए ऐसा कोई सपना 
फिर मिल पाए वही ऊर्जा 
एक घर को 
जो पिता के होने से होती है । 

हे ईश्वर ! 
कोई कैसे यह समझ पैदा करे कि बिना झिझके सीख पाए कहना 
"पिता नहीं है" । 

और कितनी भी क़समें खाते जाएँ हम 
कि नहीं आने देंगे किसी भी और का ज़िक़्र यहाँ 
पर एक समय था,एक शहर था बुद्ध का,एक साथ था, 
फल्गु नदी बहती थी,
विष्णुपद मंदिर में पूर्वजों को दिलाई जाती थी मुक्ति । 
हम यहाँ दोबारा आएँगे और करेंगे पिण्ड-दान 
ऐसा कहती,भविष्य की योजनाएँ बनाती एक लड़की 
जा बैठी है अतीत में कहीं । 

आख़िरी स्मृतियों में बचती है रेल,
प्लेटफॉर्म पर हाथ हिलाते हुए पीछे छूट जाना । 
उस आख़िरी साथ में पहली बार उन्होंने बताए थे अपने सपने । 

सात साल पहले इसी दिन वे लौटे 
हमने उन्हें जला दिया । 
फिर कभी नहीं लौटे 
पिता । 






Friday, April 10, 2015

मैं उम्मीदों के आँसू उछालता हूँ और.........

शाम के सात बजे हैं । मैं अभी सो कर उठा हूँ । मुझे याद है,जब मुझे नींद आ रही थी तब मैं परेशान था । डरियेगा मत । आत्महत्या वाला परेशान नहीं । अभी सो कर उठा हूँ तो लगता है जैसे किसी भूलभुलैया में हूँ । उठता हूँ तो कभी लगता है बचपन में उठा हूँ,कभी घर में और कभी दिल्ली में । उठते ही बदहवास-सा जाने क्या खोजता हूँ । घर की चौथी मंज़िल से मुंबई शहर डरावना दिख रहा है । मैं अगर ख़ुश होता तो लिखता कि घर की चौथी मंज़िल से मुंबई शहर बहुत ख़ूबसूरत दिख रहा है । पर मैं दुखी तो नहीं हूँ । 

                                             दूर-दूर तक लाल-पीली रोशनियाँ दिखाई दे रहीं हैं । बंद खिड़की से बाहर दिखती गाड़ियाँ  बिना आवाज़ के सरपट दौड़ रही हैं । रोशनी से याद आया जिसे मैं अपने जीवन की रोशनी समझता था वह पिछले साल इन्हीं दिनों मुझसे किनारा कर गई । नीचे छोटे बच्चे खेल रहे हैं । कुछ लोग बातें कर रहे हैं और खूब हँस रहे हैं । एक लम्बी सड़क दिखती है जिस पर गाड़ियाँ दौड़ रही हैं । सब इधर-उधर भागे जा रहे हैं । कोलाहल-सा है । मैं ठीक-ठीक अंदाज़ा नहीं लगा पा रहा हूँ कि मुझे क्या दुःख है । मायूसी क्यों बैठी जा रही है अंदर । देखा जाए तो अपने देश के पिचयान्वे प्रतिशत लोगों से अच्छा जीवन बिता रहा हूँ । 

                                                                               यह शहर पागलों का शहर लगता है । सब को बहुत जल्दी अमीर बनना है,मशहूर होना है। बुलबुले सा शहर है जैसे अभी सब होश में आ जाएँगे और बहुत रोएँगे कि क्या कर रहे हैं अपनी ज़िन्दगी के साथ । गुब्बारे से इस शहर में कोई हल्के से सुई चुभा दे या कोई ग़ुस्से में हो तो फोड़ ही दे । जैसे एक भले दिन सब फूट जाएगा और असली,नया और धुला हुआ शहर बाहर आएगा । 

                                                                  बेपरवाही सारी गुम हो गई है । जब नकली बन कर मिलता हूँ तो सब पसंद करते हैं ।जब बिलकुल खुद जैसा होता हूँ तो कोई पूछता तक नहीं । ऐसे ही तो,लोग आपको नकली बनने पर मजबूर करते हैं और नकली लोगों के लिए,नकली ख़ुशी की तलाश में हम नकली होते चले जाते हैं । 

                                  वह जब से छोड़ कर गई है,किसी के भी क़रीब जाने में डर लगता है । अपनी परेशानियों का बोझ किसी और पर क्यों लादा जाए ।क्यों अपना अँधेरा किसी के दिमाग़ में भरूँ । अपने बारे में बात करने को वैसे भी कोई नहीं मिलता । मैं उम्मीदों के आँसू उछालता हूँ और थोड़ा और मायूस होता जाता हूँ । 

                     नींद में काँटे उग आए हैं । अभी सोते समय एक दोस्त का फ़ोन आया था,मैं फ़ोन साइलेंट पर कर के फिर सो गया । मुझे और पैसे कमाने हैं । कुछ अच्छा पढ़ने को मिलता ही नहीं । पता नहीं लोग क्या-क्या लिख रहे हैं । बाहर कितनी अच्छी फ़िल्में बनती हैं । यहाँ तो कोई अच्छा काम करने की कोशिश भी करता है तो आस पास वाले ही टाँग खींचने में लगे रहते हैं । 

गुरमीत राम रहीम सिंह के गाने आते हैं,फिल्म आती है । आनंद पटवर्धन जीवन भर फ़िल्में बनाते हैं और कितने लोग जानते हैं । अपराधियों को चुन कर संसद भेज दिया जाता है । वह कैसे लोग होंगे जिन्हें हिंसा से सुक़ून मिलता है। वो कैसी पढ़ी-लिखी नौकरी करती लड़कियाँ होंगी जो शादी के बाद अपना नाम बदल लेती हैं । मेरा तो बचपन से एक नाम है और मैं तो उसे किसी के लिए ना बदलूँ । मुझे कब से गिटार सीखना है । कितना काहिल हूँ मैं । दिल्ली जाने का मन भी करता है और डरता भी हूँ । उससे सामना कभी हुआ तो क्या होगा । जिसके थोड़ा क़रीब जाता हूँ उसी के प्रति मन में कटुता आ जाती है । मैं और लोगों को नहीं जानना चाहता । सब दूर से ही अच्छे लगते हैं । इतना सारा काम रहता है करने को,मैं सोता क्यों हूँ । 

                                    सब कुछ फिसलता हुआ सा लगता है । कितना मन करता है किसी से बात करने का । यहाँ समुन्दर है । मेरे कभी काम नहीं आया । मैं इंतज़ार ही करता रह गया । माँ के साथ वक़्त बिताना है । भतीजों को बड़ा होते देखना है । कितना कुछ सीखना है । बहुत समय ख़राब किया मैंने । लोगों में करुणा ख़त्म होती जा रही है । दूसरोँ के जीवन में होने वाले तमाशे हमें सुख देते हैं । मुझे रात में ठीक समय पर सोना शुरू करना है । सारा दुःख अपनों से ही मिलता है । पुरुषों के अंदर इतना ग़ुस्सा क्यों भरा है । जिनके सुर नहीं लगते,उनके गाने आते हैं और हिट हो जाते हैं । मैंने बहुत पहले इस दुनिया के बनाए मानकों पर खरा उतरना छोड़ दिया है । किसी भी संस्था में पाँच लोग बैठ कर बच्चों का भविष्य तय कर रहे  होते हैं ।   

                                                                कुछ नया बनाने के लिए पुराना सब तोड़ना पड़ता है या कहूँ छोड़ना पड़ता है । पर पुराना छूटे ही नहीं तो । जब ग़ुस्सा आए तो क्या करना चाहिए । आप जिनको जितना महत्व देते हैं,उनके लिए आप उतने ज़रूरी ना रह जाएँ तो क्या करना चाहिए । 

                                                                                              रात में कभी भी नींद खुलती है तो खिड़की से, अँधेरे में दूर तक दुःख साफ़ नज़र आता है । बेचैनी होती है । पीछे ही रह गया सब ।घर,माँ,पिता,दिल्ली,प्यार । मैं कहाँ आगे जा रहा हूँ । कितना कुछ बस छूटता जाता है । पीछे मुड़ कर देखूँ तो सारे पुल ख़ुद ही तो ध्वस्त किए हैं ।जब उनके सामने हँस रहा होता हूँ,तब आँखों में रखे काँटे और अंदर तक धँसते हैं। वे कहते हैं ख़ुद को मार कर क्यों जीते हो । 

यह शहर ऐसा क्या देगा हमें जो हम सब कुछ छोड़ कर पागल हुए पड़े हैं ।  
              

Wednesday, April 08, 2015

यहाँ रख छोड़ा है मैंने तुम्हें

मिट्टी,
पानी,
आकाश,
रौशनी का गोला,
मेरी दृष्टि 
और साँझ । 

तुम्हें पता है ?
यहाँ रख छोड़ा है मैंने तुम्हें 
यहीं मिलता हूँ रोज़ तुमसे । 
कोई बताए !

बहुत दूर जाना पड़ता है तुमसे मिलने 
इसी में सारा दिन मेरा निकला जाता है । 

और 
यह गोला पानी में डूबकर 
दूसरी दुनिया में चला जाता है 
जैसे तुम चली गई हो 
दूसरी दुनिया में 
सारी रौशनी ले कर । 

मेरी आँखों को अँधेरा नहीं सुहाता ।