Saturday, February 28, 2015

देर तक मेरा फड़फड़ाना ज़िंदा रहे

मैं उड़ना सीखूंगा जब 
तुम मेरे पंखों को बाँध देना । 

जैसे लड़खड़ाता था तुम्हारे पास आते आते 
तुमसे दूर जाते हुए भी वैसे ही लड़खड़ाता हूँ 
और मेरी चलने की चाह ख़त्म होती जाती है ।  

किसी युद्ध में जैसे एक छोटा सा बच्चा 
अपनी जान बचाने को बदहवास दौड़ता रहे 
और छुपने की जगह मिलने पर 
बैठ कर रो पाए चैन से 
ऐसे 
गोद नसीब हो तुम्हारी 
बच्चे को मार जाए गोली कोई । 

और जब मैं मासूम कबूतर हो जाऊँ 
तुम्हारे घर की खिड़की के एक कोने में 
बनाऊँ एक घर । 

मेरी उड़ने की मंशा और बंधे पंखों के बीच 
देर तक मेरा फड़फड़ाना ज़िंदा रहे । 


Saturday, February 21, 2015

अकेले छूट जाने का डर एक रोग की तरह था तब

एक स्त्री रहती थी 
दिलाती रहती विश्वास निरंतर 
कि रहेगी हमेशा 
अकेले छूट जाने का डर एक रोग की तरह था तब 
रोज़ घुलता बूँद-बूँद नसों में । 

कमाल की बात है जी !

अकेला छूट चुका हूँ 
कोई डर नहीं अब ऐसा 
सब जकड़ती जाती ज़ंजीरें हौले-हौले 
गल गईं जैसे ख़ुद ही 
बहते द्रव्य में कितना स्पष्ट है चेहरा तुम्हारा । 

नहीं होने में कितना सारा होना छुपा है । 

Friday, February 20, 2015

एक मनहूस दिन में हँसते हुए बेचोगी मेरा आत्मसम्मान

मुझे दो दृश्य याद आते हैं 

किसी गाँव में कहीं तुम जीने पर खड़ी हो 
मूँह फुलाए ग़ुस्से में,
मैं कहीं बाहर से इंतज़ार में हूँ 

फिर एक छत है 
हम घुट रहे हैं 
और बेशर्म चाँद की रौशनी में 
पैदा कर रहे हैं आग । 

झुलसाएगी बहुत गर पैदा हुई आग 
तुम्हारी आँखों में जला देगी मेरा चेहरा 
पहचानने से करोगी इंकार 
मैं चुनूँगा प्यार 
एक मनहूस दिन में हँसते हुए बेचोगी मेरा आत्मसम्मान । 

हम जब अपना पागल होना बचा रहे थे माँ 
एक लड़की बार-बार दिमाग़ पे चोट कर के चली जाती थी ।