एक स्त्री रहती थी
दिलाती रहती विश्वास निरंतर
कि रहेगी हमेशा
अकेले छूट जाने का डर एक रोग की तरह था तब
रोज़ घुलता बूँद-बूँद नसों में ।
कमाल की बात है जी !
अकेला छूट चुका हूँ
कोई डर नहीं अब ऐसा
सब जकड़ती जाती ज़ंजीरें हौले-हौले
गल गईं जैसे ख़ुद ही
बहते द्रव्य में कितना स्पष्ट है चेहरा तुम्हारा ।
नहीं होने में कितना सारा होना छुपा है ।
दिलाती रहती विश्वास निरंतर
कि रहेगी हमेशा
अकेले छूट जाने का डर एक रोग की तरह था तब
रोज़ घुलता बूँद-बूँद नसों में ।
कमाल की बात है जी !
अकेला छूट चुका हूँ
कोई डर नहीं अब ऐसा
सब जकड़ती जाती ज़ंजीरें हौले-हौले
गल गईं जैसे ख़ुद ही
बहते द्रव्य में कितना स्पष्ट है चेहरा तुम्हारा ।
नहीं होने में कितना सारा होना छुपा है ।
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