Monday, February 24, 2014

किसी को अपने से अलग होने के लिए कहना

तुम आना
जब मैं भूल जाऊँगा इस दुनिया को  
मेरी उंगली पकड़ कर
मुझे ले जाना वापस
लोगों के बीच


जहां हर बड़ा आदमी
दूसरे बड़े आदमी को जानता है


जहां लोग बड़े बड़े फ़ैसले
झट से ले लेते हैं
देख पाते हैं अपना जीवन
साफ़-सुथरा दूर तलक


जहां तोड़ दिया जाता है
उन रिश्तों को
जिनका कोई नाम नहीं होता
जिनमे रहने के लिए कोई बाध्य नहीं होता
पर अलग होने के लिए होता है


किसी को अपने साथ रहने के लिए कहना
ज़बरदस्ती तो होती है
पर किसी को अपने से अलग होने के लिए कहना
कोई ज़बरदस्ती नहीं होती


और आपको चुपचाप ख़ामोशी से
बिना किसी तमाशे के
बस मान लेना होता है
क्योंकि ऐसे में भी निभाना होता है प्यार
उससे जो कह चुका है
कि उसे प्यार था अब नहीं है


कहाँ से सीखा तुमने 
किसी को यूं आत्मा में बसा लेना 
और केंचुल की तरह उतार फेंकना ।

Tuesday, February 04, 2014

वो मेरे सामने बैठी मुस्कुरा रही थी

जब बातें शुरू होने से पहले
ख़त्म होने लगी थीं
और सब कुछ भूल कर
लड़खड़ाते हाथों से भी लिखना था
कैसा होता है नकली होते चले जाना
कैसा होता होगा असली रूप में लौटना
और हर निर्णय मजबूरी रहा हो |

“उम्मीद” जितना घातक शब्द है
उतना ही सुंदर भी
और अगर याचना ही अंत है
तो तुमसे क्यों नहीं ?
मेरे पेट में ख़ंजर भोंका गया था
और मैं समझने की कोशिश में था
मुझे लाल रंग नहीं दिखा
आईना दिखा और दो चेहरे
मेरी आँखें बुझती गयीं
चेहरे चूमते रहे एक दूसरे को
इन चेहरों में झुर्रियां पड़नी थीं साथ-साथ
और हमें अतीत में भी जाना था
वही ख़ंजर पलट के मार देना था
पर मैं समझने की कोशिश में था
और वो मेरे सामने बैठी मुस्कुरा रही थी |