कुछ पता ही नहीं चलता
नीयत का भरोसा किया भी तो नहीं जा सकता
स्वार्थ की मोहताज है या पैसों की
मुझे भी सीखना है
तीर छोडना,वार करना
पर फिर वही सवाल
दुश्मन का तो पता ही नहीं है कौन है
कहीं कोई दोस्त मारा गया तो ?
या कोई दुश्मन बच गया तो ?
किस दिशा में तीर छोडूं ?
थोड़ा सा निर्दयी तो होना ही चाहिए
खून बहा तो मैं भी दूं
पर समझ में तो आये
किसका बहाना है ?
एक तरह से देखा जाए तो मैं सिर्फ अपना हूँ
थोड़ा उदार हो जाऊं तो कहूँगा
सब ही तो मेरे अपने हैं..
फिर ?
यह तो नीयत की करामात है
दोस्त से नफरत हो जाती है,दुश्मन से प्यार
प्यार खुद से भी किया है बहुत,काश ख्याल भी रख पता
पर यह कैसा समय है ?
देखो मेरी नीयत बदल रही है
और मैं खुद से नफरत नहीं कर पा रहा हूँ ...
यह कौन सी लड़ाई है ?





