Saturday, March 14, 2015

कोई आवाज़ लगाता है मुझे

तुम 
जो अंतर्मन में बैठी हो 
तुमसे 
मैं फुसफुसाकर पूछता हूँ 
मैं जाऊँ ?
यथार्थ का बोध है मुझे पर 
तुम्हारे लौटने की आस का कोई अंत नहीं जान 

तुम 
अंतर्मन में जहाँ बैठी हो 
वहाँ से 
तुम्हारा मौन और 
तुम्हारे उस मौन में गढ़ी तुम्हारी आँखें 
बेड़ियों में क़स देती हैं मेरे दिल को 

कोई आवाज़ लगाता है मुझे !
अपना चेहरा ले कर सामने खड़ी हो जाती हो 
हटो !
हटो भी !
मुझे इन आँखों में कोई और चेहरा बसाना है ।  

Wednesday, March 11, 2015

वहाँ से यहाँ किसी ने प्यार नहीं भेजा

कोई सदियों पुरानी बात तो नहीं 
जब तुम अपनी नन्ही उँगलियों में भरा 
ख़ालीपन,
निराशा,
ग़ुस्सा,
डर,
आँसूं,
पीड़ा,
प्यार,
पन्नों पर उड़ेल कर 
उन्हें ख़त बनाती थी और 
दिल्ली की सडकों पर 
जगह-जगह मूक खड़े 
लाल डब्बों में छोड़ आती थी । 

डाकिया परेशान होगा 
वहाँ से यहाँ किसी ने प्यार नहीं भेजा 
बहुत समय बीता । 

Tuesday, March 03, 2015

दिल्ली तब मेरे साथ इतनी नहीं थी,जब मैं दिल्ली मैं था

लगता है सब साज़िशें ही हैं । छह घंटे एक मुशायरे को सुनना जैसे फिर से तुम से हो कर गुज़रना । जैसे कोई कुछ भी सुनाए,सब कुछ ठहरता एक ही जगह जा कर था । इतना क्या कम था कि रवीश जी की लिखी लप्रेक से भी गुज़रना हो गया । जैसे यह इसी लिए लिखी गई हो कि मुझे वापस लौटाया जा सके उसी दिल्ली में । शुरू करते ही लगा कि मण्डी हॉउस और वहाँ की किसी कहानी का कोई ज़िक्र होगा या नहीं । एक बार तो बात बाराखंबा तक पहुँची(तब कुछ अटका मन में)लेकिन उसके आगे नहीं ।सच कहता हूँ,यह सब साज़िशें ही हैं कि मुझे बार-बार तुम तक पहुँचाया जाए । पर किताब में शहर के बहुत से हिस्से मैं खोजता ही रह गया । मिले ही नहीं । मेरे लिए शहर में इश्क़ था या इश्क़ में शहर,पता नहीं । 

                                                                  ना शाम को रोज़ हौज़ ख़ास लौटती एक लड़की का डर था,ना तय समय सीमा में बंधी एक लड़की से प्यार में पड़े एक लड़के के धैर्य,ग़ुस्से और घुटन की बातें । ना इंडिया हैबिटेट सेंटर वाली शुरुआत,ना प्रगति मैदान का इक़रार और ना मण्डी हॉउस का प्यार । ना अक्षरधाम मेट्रो का इंतज़ार और ना मयूर विहार के आवारा रास्ते । ना बंगाली मार्केट का मीठा पान और ना जनपथ के स्वेटर । ना सेंट्रल सेक्रेटेरिएट मेट्रो की दीवारें खुरचना,ना कोई नाटक,ना ग्रीन रूम,ना स्टेज । ना ही भविष्यों को अलग करती निजामुद्दीन स्टेशन से निकलती ट्रेन । शहर में एक कोना होना,उसका उजड़ना और शहर का उजड़ जाना । 

                  और एक जगह जहाँ पहुँच कर सब ख़त्म हो गया था,जिसका ज़िक्र करने से मैं आज भी बच कर निकल गया । दिल्ली में डर होना और अब डर में दिल्ली होना । 

                                   दिल्ली तब मेरे साथ इतनी नहीं थी,जब मैं दिल्ली मैं था ।  

Monday, March 02, 2015

और बचपन की सारी समझदारी तुम भूलोगे

छह साल का एक बच्चा 
क्या हो सकता है दार्शनिकों की तरह उदास और गुमसुम ?
बचपन में ही कोई हो जाता है अंतर्मुखी 
कुरेदना पड़ता है उसे। 

पूछने पर ग़ुस्से और घुटन के मिश्रित भाव ले कर 
बताता है,
"भगवान कहीं नहीं होते 
कभी नहीं आते मदद करने 
जब मैं होमवर्क करता हूँ और अटक जाता हूँ तब भी नहीं आते 
बाहर लड़ाई होती है जब तब भी नहीं आते 
स्कूल में टीचर,घर में पापा-मम्मी डाँटते हैं तब भी नहीं आते 
सुनते भी नहीं कुछ 
सब झूठ कहते हैं,नहीं होते भगवान । "

मैं तड़प कर गले लगाता हूँ उसे 
इतनी सी उम्र में,इतनी सी बातों में 
तुमने जान लिया है सच,
लेकिन 
जीवन भर तुम्हें इसका विपरीत सिखाया जाएगा 
और बचपन की सारी समझदारी तुम भूलोगे 
स्कूल में रट्टा मारते हुए । 

मैं चाहता हूँ 
तुम कंचे खेलो,गिल्ली-डंडा भी,वीडियो-गेम्स भी 
मिट्टी में लोटो,बारिश में भीगो 
और गंदे कपड़ों में घर लौटो 
नाचो,गाओ,
रसोई में खाना बनाओ,
माँ के बालों की चोटी करना सीखो,
सीखो स्वेटर बुनना,
लड़कियों के साथ बिताओ खूब सारा समय 
जवाब दो हर बात का जो लगे ग़लत 
चाहे असंभव से लगे,
नन्ही आँखों में भरो जितने भर सकते हो सपने 
बचाओ उन्हें बड़े होने तक । 

सोचो हर डर के पार 
स्कूल,फिर कॉलेज,फिर नौकरी,
फिर शादी,फिर बच्चे,
यह सब दरअसल डर हैं 
कि इस ढाँचे के बिना कैसे चलेगी ज़िंदगी 
तुम तोड़ना ऐसे ढाँचों को 

बड़े होते-होते 
तुम्हें बहुत रोका जाने वाला है 
तुम रुकना मत ।