छह साल का एक बच्चा
क्या हो सकता है दार्शनिकों की तरह उदास और गुमसुम ?
बचपन में ही कोई हो जाता है अंतर्मुखी
कुरेदना पड़ता है उसे।
पूछने पर ग़ुस्से और घुटन के मिश्रित भाव ले कर
बताता है,
"भगवान कहीं नहीं होते
कभी नहीं आते मदद करने
जब मैं होमवर्क करता हूँ और अटक जाता हूँ तब भी नहीं आते
बाहर लड़ाई होती है जब तब भी नहीं आते
स्कूल में टीचर,घर में पापा-मम्मी डाँटते हैं तब भी नहीं आते
सुनते भी नहीं कुछ
सब झूठ कहते हैं,नहीं होते भगवान । "
मैं तड़प कर गले लगाता हूँ उसे
इतनी सी उम्र में,इतनी सी बातों में
तुमने जान लिया है सच,
लेकिन
जीवन भर तुम्हें इसका विपरीत सिखाया जाएगा
और बचपन की सारी समझदारी तुम भूलोगे
स्कूल में रट्टा मारते हुए ।
मैं चाहता हूँ
तुम कंचे खेलो,गिल्ली-डंडा भी,वीडियो-गेम्स भी
मिट्टी में लोटो,बारिश में भीगो
और गंदे कपड़ों में घर लौटो
नाचो,गाओ,
रसोई में खाना बनाओ,
माँ के बालों की चोटी करना सीखो,
सीखो स्वेटर बुनना,
लड़कियों के साथ बिताओ खूब सारा समय
जवाब दो हर बात का जो लगे ग़लत
चाहे असंभव से लगे,
नन्ही आँखों में भरो जितने भर सकते हो सपने
बचाओ उन्हें बड़े होने तक ।
सोचो हर डर के पार
स्कूल,फिर कॉलेज,फिर नौकरी,
फिर शादी,फिर बच्चे,
यह सब दरअसल डर हैं
कि इस ढाँचे के बिना कैसे चलेगी ज़िंदगी
तुम तोड़ना ऐसे ढाँचों को
बड़े होते-होते
तुम्हें बहुत रोका जाने वाला है
तुम रुकना मत ।
क्या हो सकता है दार्शनिकों की तरह उदास और गुमसुम ?
बचपन में ही कोई हो जाता है अंतर्मुखी
कुरेदना पड़ता है उसे।
पूछने पर ग़ुस्से और घुटन के मिश्रित भाव ले कर
बताता है,
"भगवान कहीं नहीं होते
कभी नहीं आते मदद करने
जब मैं होमवर्क करता हूँ और अटक जाता हूँ तब भी नहीं आते
बाहर लड़ाई होती है जब तब भी नहीं आते
स्कूल में टीचर,घर में पापा-मम्मी डाँटते हैं तब भी नहीं आते
सुनते भी नहीं कुछ
सब झूठ कहते हैं,नहीं होते भगवान । "
मैं तड़प कर गले लगाता हूँ उसे
इतनी सी उम्र में,इतनी सी बातों में
तुमने जान लिया है सच,
लेकिन
जीवन भर तुम्हें इसका विपरीत सिखाया जाएगा
और बचपन की सारी समझदारी तुम भूलोगे
स्कूल में रट्टा मारते हुए ।
मैं चाहता हूँ
तुम कंचे खेलो,गिल्ली-डंडा भी,वीडियो-गेम्स भी
मिट्टी में लोटो,बारिश में भीगो
और गंदे कपड़ों में घर लौटो
नाचो,गाओ,
रसोई में खाना बनाओ,
माँ के बालों की चोटी करना सीखो,
सीखो स्वेटर बुनना,
लड़कियों के साथ बिताओ खूब सारा समय
जवाब दो हर बात का जो लगे ग़लत
चाहे असंभव से लगे,
नन्ही आँखों में भरो जितने भर सकते हो सपने
बचाओ उन्हें बड़े होने तक ।
सोचो हर डर के पार
स्कूल,फिर कॉलेज,फिर नौकरी,
फिर शादी,फिर बच्चे,
यह सब दरअसल डर हैं
कि इस ढाँचे के बिना कैसे चलेगी ज़िंदगी
तुम तोड़ना ऐसे ढाँचों को
बड़े होते-होते
तुम्हें बहुत रोका जाने वाला है
तुम रुकना मत ।
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