Tuesday, March 03, 2015

दिल्ली तब मेरे साथ इतनी नहीं थी,जब मैं दिल्ली मैं था

लगता है सब साज़िशें ही हैं । छह घंटे एक मुशायरे को सुनना जैसे फिर से तुम से हो कर गुज़रना । जैसे कोई कुछ भी सुनाए,सब कुछ ठहरता एक ही जगह जा कर था । इतना क्या कम था कि रवीश जी की लिखी लप्रेक से भी गुज़रना हो गया । जैसे यह इसी लिए लिखी गई हो कि मुझे वापस लौटाया जा सके उसी दिल्ली में । शुरू करते ही लगा कि मण्डी हॉउस और वहाँ की किसी कहानी का कोई ज़िक्र होगा या नहीं । एक बार तो बात बाराखंबा तक पहुँची(तब कुछ अटका मन में)लेकिन उसके आगे नहीं ।सच कहता हूँ,यह सब साज़िशें ही हैं कि मुझे बार-बार तुम तक पहुँचाया जाए । पर किताब में शहर के बहुत से हिस्से मैं खोजता ही रह गया । मिले ही नहीं । मेरे लिए शहर में इश्क़ था या इश्क़ में शहर,पता नहीं । 

                                                                  ना शाम को रोज़ हौज़ ख़ास लौटती एक लड़की का डर था,ना तय समय सीमा में बंधी एक लड़की से प्यार में पड़े एक लड़के के धैर्य,ग़ुस्से और घुटन की बातें । ना इंडिया हैबिटेट सेंटर वाली शुरुआत,ना प्रगति मैदान का इक़रार और ना मण्डी हॉउस का प्यार । ना अक्षरधाम मेट्रो का इंतज़ार और ना मयूर विहार के आवारा रास्ते । ना बंगाली मार्केट का मीठा पान और ना जनपथ के स्वेटर । ना सेंट्रल सेक्रेटेरिएट मेट्रो की दीवारें खुरचना,ना कोई नाटक,ना ग्रीन रूम,ना स्टेज । ना ही भविष्यों को अलग करती निजामुद्दीन स्टेशन से निकलती ट्रेन । शहर में एक कोना होना,उसका उजड़ना और शहर का उजड़ जाना । 

                  और एक जगह जहाँ पहुँच कर सब ख़त्म हो गया था,जिसका ज़िक्र करने से मैं आज भी बच कर निकल गया । दिल्ली में डर होना और अब डर में दिल्ली होना । 

                                   दिल्ली तब मेरे साथ इतनी नहीं थी,जब मैं दिल्ली मैं था ।  

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