Sunday, June 28, 2015

मैं तुम्हें धोखा देना चाहता हूँ

मेरी आँखों से इतना क्यों गिरता है 
मीठा नहीं हुआ क्या अभी तक तुम्हारी आँख का पानी !

फिर करवट बदलो 
तुम्हारी पीठ पर लिख दूँ अपना नाम 
पलट कर तुम भर लो मेरी पीठ का मांस नाखूनों में । 

रात जैसे बनी हो भूलने के लिए 
यह भी कि कोई रात थी भी ऐसी सुक़ून भरी 
जब कम पड़ गई थी सारी आग 
और जिस्म से बहता था लावा 

होंठों से फूँकना साँसे रात भर एक दूसरे के सीने में 
और सुबह तक मर जाना 
प्यार हो तो इतना कि छोड़े भी ना और मारता भी जाए । 

दुर्दिनों में छोड़ जाए,
तड़पाए,
पर लौटो । 

जैसे बाढ़ उतरती है नदी में 
ऐसे उतरो मुझ में
कर जाओ सब तहस-नहस । 

जाड़ों की गुनगुनी धूप की तरह छूओ मेरे चेहरे को 
फैल जाए उजास 
ओस जैसे गिरो होंठों पर 
लौट आओ जैसे लौट आती हैं सर्दियाँ 
हर साल । 

लौट आओ 
मैं तुम्हें धोखा देना चाहता हूँ ।  



Sunday, June 07, 2015

बात तक करने को इंसान ना मिल पाने के अभाव में

मैं बिल्कुल नहीं कहना चाहता कि उनकी आँखें नहीं हैं 
पर यह सच है कि वो देख नहीं सकते 
और जो देख सकते हैं वो इतना देख चुके हैं कि हार कर 
अपनी नज़र की हत्या कर चुके हैं । 
ऐसा करना उनकी ख़ुद को ज़िंदा रख पाने की जद्दोज़हद है बस । 

और यक़ीन मानिए 
मैं जिन फेरों में फँसा हूँ 
खुद एक चक्रव्यूह हो गया हूँ 
जिसे मैंने रचा और फँसकर रह गया 
इसकी साँकलें तोड़कर जब मैं बाहर निकलूँगा 
तब ख़ुद भी भूल जाऊँगा अपने जैसों को और 
दंभ में कहूँगा कि हाँ मुझे कुछ नहीं दिखता 
मुझे अब चैन से जी लेने दो । 

यह जो एक दीवार मेरे माथे और 
मेरी आँखों में बन गई है 
जिससे मैं बाहर का कुछ देख नहीं पाता 
और अंदर पूरी एक इबारत लिखी है उलझे अतीत की 
कब तोड़ पाऊँगा इसे ऐसा खुद को कोसते 
मैं अपने इंतज़ार में हूँ । 

मैं अपने इंतज़ार में हूँ कि लौटूँगा 
तुम्हारे पास नहीं 
इस बार एक दफ़ा ख़ुद के पास । 

यह दीवार जिसका मैंने अभी ऊपर ज़िक्र किया 
जिसे मैं तोड़ना चाहता हूँ 
इस पर कभी किसी ने अपने हाथों से पोता था प्यार 
और जहाँ दीवार की आँख थी वहाँ चूमा था बारी-बारी 
पहले बायीं फिर दायीं या शायद ....
हाँ इसी क्रम में । 
जी हाँ दीवार की आँख थी जो बहती भी थी । 

रँग पपड़ी-पपड़ी कर के उतरता है 
मैं भी रोज़ कुरेदता हूँ 
नाख़ून दाँतों से ही चबाता हूँ 
बड़े हो नहीं पाते 
दीवार पर नया रँग पोतता हूँ 
काला । 

बचपन में आँगन में लगा अमरूद का पेड़ 
अमरूद कम और मधुमक्खी के छत्ते ज़्यादा उगाने लगाने था 
माफ़ कीजिए 
मधुमक्खी नहीं ततैया 
पीली-पीली । 

गले में फँस कर रह गया है नाम 
आँखों में धँस कर रह गया है चेहरा 
माथे में गढ़ गई हैं आँखें 
तुम्हारी । 
मेरी स्मृति पर ऐसा कब्ज़ा किया गया है 
जैसा दिल्ली पर कितनी बार किया था 
तुर्कों,अफ़ग़ानों और मुग़लों ने 
और छोड़ दिया था लुटा-पिटा । 

मेरी आँखें अभी हैं क्योंकि मैं भोग रहा हूँ 
कब तक रहेंगी पता नहीं 
पर एक अपील उन सबसे जो देख नहीं पा रहे !

बात तक करने को इंसान ना मिल पाने के अभाव में 
कई लोगों ने सीखा है 
ख़ुद से बातें करना,बड़बड़ाना और पागल हो जाना 
चिल्लाना,उदास रहना,हिंसक हो जाना 
दवाईयाँ गटक कर झेलना अवसाद 
या बस 
कूद जाना छतों से,खिड़कियों से, बालकनियों से । 

सबसे तेज़ चिल्ला वही रहा है जो घुट रहा है 
जो बहुत ज़्यादा सो रहा है वो उठ रहा है 
इन्हें भी ले जाइए अपनी रंगीनियों में 
घबराते है जो साँस के हर उतार-चढ़ाव के साथ । 

खोलिए ना आँखें !
अकेलापन मार रहा है कितनों को 
वे बच गए तभी बोल पाएँगे । 

मैं अपनी आँखें बचा रहा हूँ 
आप भी बचाइए ।  

Thursday, June 04, 2015

एक बहुत यातना वाले दिन

कैसा प्रेम था ?
विवशता !

पहले प्रेम में पड़ने की विवशता 
तुम्हारे कहने पर 
फिर उससे बाहर गिरने की 
तुम्हारे ही कहने पर । 

रात होती थी और 
रोज़ उनके सधे मानकों पर खरा उतरना होता था 
वे उकसाएँ और उन्माद में उन्हें नोच खाने के बजाय 
मन मसोस कर उनके भड़कते दिल की तासीर को 
समझदारी से ठंडा कर दूँ 
तो मेरी जीत 
बताया जाए किसी बहुत हँसी वाले दिन 
यह तो कसौटी थी 
तुम उत्तीर्ण हुए 
लायक हो प्रेम के । 

हम आज़माने के लिए थे 
छले गए अच्छे । 

दीवारों से लिपट कर रोते 
और चाटते कागज़ प्यार के 
खुरचते ज़मीन पर बिछी रंगीनियाँ । 

भर लाए हैं नाखूनों में 
रँग सारा 
रोज़ चबाते थोड़ा-थोड़ा कर के । 

तुम्हारे एक बार नकारने से चले आते 
चुप-चाप 
जैसा तय किया था 
एक बहुत यातना वाले दिन ।