Sunday, June 28, 2015

मैं तुम्हें धोखा देना चाहता हूँ

मेरी आँखों से इतना क्यों गिरता है 
मीठा नहीं हुआ क्या अभी तक तुम्हारी आँख का पानी !

फिर करवट बदलो 
तुम्हारी पीठ पर लिख दूँ अपना नाम 
पलट कर तुम भर लो मेरी पीठ का मांस नाखूनों में । 

रात जैसे बनी हो भूलने के लिए 
यह भी कि कोई रात थी भी ऐसी सुक़ून भरी 
जब कम पड़ गई थी सारी आग 
और जिस्म से बहता था लावा 

होंठों से फूँकना साँसे रात भर एक दूसरे के सीने में 
और सुबह तक मर जाना 
प्यार हो तो इतना कि छोड़े भी ना और मारता भी जाए । 

दुर्दिनों में छोड़ जाए,
तड़पाए,
पर लौटो । 

जैसे बाढ़ उतरती है नदी में 
ऐसे उतरो मुझ में
कर जाओ सब तहस-नहस । 

जाड़ों की गुनगुनी धूप की तरह छूओ मेरे चेहरे को 
फैल जाए उजास 
ओस जैसे गिरो होंठों पर 
लौट आओ जैसे लौट आती हैं सर्दियाँ 
हर साल । 

लौट आओ 
मैं तुम्हें धोखा देना चाहता हूँ ।  



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