कैसा प्रेम था ?
विवशता !
पहले प्रेम में पड़ने की विवशता
तुम्हारे कहने पर
फिर उससे बाहर गिरने की
तुम्हारे ही कहने पर ।
रात होती थी और
रोज़ उनके सधे मानकों पर खरा उतरना होता था
वे उकसाएँ और उन्माद में उन्हें नोच खाने के बजाय
मन मसोस कर उनके भड़कते दिल की तासीर को
समझदारी से ठंडा कर दूँ
तो मेरी जीत
बताया जाए किसी बहुत हँसी वाले दिन
यह तो कसौटी थी
तुम उत्तीर्ण हुए
लायक हो प्रेम के ।
हम आज़माने के लिए थे
छले गए अच्छे ।
दीवारों से लिपट कर रोते
और चाटते कागज़ प्यार के
खुरचते ज़मीन पर बिछी रंगीनियाँ ।
भर लाए हैं नाखूनों में
रँग सारा
रोज़ चबाते थोड़ा-थोड़ा कर के ।
तुम्हारे एक बार नकारने से चले आते
चुप-चाप
जैसा तय किया था
एक बहुत यातना वाले दिन ।
विवशता !
पहले प्रेम में पड़ने की विवशता
तुम्हारे कहने पर
फिर उससे बाहर गिरने की
तुम्हारे ही कहने पर ।
रात होती थी और
रोज़ उनके सधे मानकों पर खरा उतरना होता था
वे उकसाएँ और उन्माद में उन्हें नोच खाने के बजाय
मन मसोस कर उनके भड़कते दिल की तासीर को
समझदारी से ठंडा कर दूँ
तो मेरी जीत
बताया जाए किसी बहुत हँसी वाले दिन
यह तो कसौटी थी
तुम उत्तीर्ण हुए
लायक हो प्रेम के ।
हम आज़माने के लिए थे
छले गए अच्छे ।
दीवारों से लिपट कर रोते
और चाटते कागज़ प्यार के
खुरचते ज़मीन पर बिछी रंगीनियाँ ।
भर लाए हैं नाखूनों में
रँग सारा
रोज़ चबाते थोड़ा-थोड़ा कर के ।
तुम्हारे एक बार नकारने से चले आते
चुप-चाप
जैसा तय किया था
एक बहुत यातना वाले दिन ।
No comments:
Post a Comment