Wednesday, April 02, 2014

मैं खा लेता हूँ एक मीठा पान

मैंने सीखा था प्रेम में होना
     अब मैं सीख रहा हूँ
     प्रेम में ना होना |
     मैं चुन रहा हूँ उन पलों को
     जो याद रखने हैं
     जिनमें तुम निष्ठुर थीं
     भुला रहा हूँ वह समय
     जो जोंक की तरह चिपक गया है
     मेरे माथे से
     जो घुस गया है मेरी आँखों में
     जिनमें तुम और मैं थे
     मैं अंतर नहीं कर पा रहा हूँ |

     पलट कर यूँ ही तुमसे कुछ पूछ
     लेने का मन करता है
     फिर याद आ जाता है
     अब सिर्फ मैं ही हूँ
     तभी यहाँ किसी सड़क पे
     दिख जाता है पान का खोखा
     मैं खा लेता हूँ एक मीठा  पान
     पर अब पहले की तरह उगल नहीं देता
     निगल लेता हूँ
     स्वाद कभी वैसा नहीं होता
     कभी खुद ही अपनी आँखों में लगा लेता हूँ काजल
     और देख लेता हूँ दोनों को आईने में
     चाँद जो तुमने देखना सिखाया था
     उम्र भर अकेले ही देखना होगा
     यह टीस मुझे फिर लौटा लाती है
     जहाँ से मैं रोज़ थोड़ा भागना चाहता हूँ |

     अब तुम कुछ भी मेरे लिए नहीं करती
     काश थोड़ी ग़लतफहमी तो मेरे हिस्से
     छोड़ दी होती    
     प्रेम कितना दूर ले आया है
     तुम्हें नहीं मुझे
     जानता हूँ
     तुम इस तरह नहीं सोच पाओगी ।  
              

      

Tuesday, April 01, 2014

मैं किरकिरी ही सही चुभता रहूँगा उम्र भर


कब तक ज़ुबाँ को सलीके में रखा जाए 
जो हुआ उसे धोखा मान ही लिया जाए

बहुत अरसा हुआ आज नाराज़गी पनपी है

मैंने ही पाले थे भरम मान ही लिया जाए
         
मैं किरकिरी ही सही चुभता रहूँगा उम्र भर
तेरी आँखों से कोई और बहेगा मान ही लिया जाए


चाहा था समझते रहें एक-दूसरे को हमेशा
तूने समझ ली है दुनिया मान ही लिया जाए