Tuesday, May 26, 2015

हम खुद को बचाते हैं

वे सब 
जिनसे हम प्यार में है 
ग़लतफ़हमियों के शिक़ार होते जाते हैं 
एक-एक बात 
नुकीली कील-सी ठोकते हैं दिमाग़ में 
भरते जाते हैं अपनी कुंठाओं का नीला रँग 
उनके सीने में 
लिपटते हैं,फिर उन्हीं से बचते हैं 
फिर उन्हीं को नोचते हैं । 

कैसे-कैसे 
हम खुद को बचाते हैं । 

Thursday, May 21, 2015

किस किसका फ़ोन उठाते हैं आप ?

आपको तैयार रहना चाहिए ना 
हर किसी के स्वागत के लिए 
कि घंटी बजे और आप मुस्कुराएँ 
सब भूल कर साथ बैठें और पीएँ अदरक वाली चाय 
फिर चाहे 
वे सीधे छाती पर चढ़ आते हों 
माथे को लाल सन्न कर जाते हों 
कौन सी बात को क्या रूप दे कर 
किस तरह बताते हों । 

आप लोगों से मिलने में इतना क्यों घबराते हो । 

कहाँ आप सहज हो 
कहाँ से भाग जाना चाहते हो 
कहाँ आप सिर्फ़ सुनते हो 
कहाँ थोड़ा बोल भी पाते हो !

कितने पाले हैं आस्तीन में साँप ! 

किस किसका फ़ोन उठाते हैं आप ?

Monday, May 18, 2015

काश दिल नाखूनों में होता,रोज़ चबा लिया करता थोड़ा

फिर एक समय आता है 
जब आप माँग नहीं सकते 
दे भी नहीं पाते 
तब 
सिखाना पड़ता है खुद ही खुद को पालना 
लम्बी साँसें भर कर गले में उतारना पड़ता है सारा तेज़ाब 
फेँक देना होता है खुद को उदासी वाले किसी देश में 
कोई अपनी आँखें 
अपनी ममता ले कर 
नहीं पहुँच पाए जहाँ तक 
सीने से उठते सब शब्द सिर को हौले हौले करते हैं ज़ख्मी । 

काश दिल नाखूनों में होता,रोज़ चबा लिया करता थोड़ा । 

कितना चाहा होगा ना आपने कि साथ रहें 
जो चाहा वही तो नहीं मिला बस 
बाक़ी तो कितना हँसते हैं हम ।  

Saturday, May 09, 2015

एक अद्भुत रहस्य की तरह घटी तुम

सर्द होती संवेदनाओं के नाम 
इस शाम 
देता हूँ पैग़ाम 
कहीं बहुत दूर से आती 
कानों में पड़ती है एक हँसी 
किसकी !
क्या जानूँ ?
एक अद्भुत रहस्य की तरह घटी तुम । 

माज़ी की सारी परतें चीरते हुए 
तुम तक पहुँचने की कोशिश करता हूँ 
सफल।
ग़ायब होती जाती हो हर जगह से 
जबरन गिराई गई एक इमारत की तरह 
ध्वस्त होते हैं सब रास्ते 
जिन पर चले थे चार पैर साथ 
और उँगलियाँ गुँथे दो हाथ । 

बुझ चुकी लौ के नाम 
रौशनी बिन 
लौ और दीये 
दोनों का क्या दाम !

अब अँधेरा घिरता आता है यहाँ 
खिड़की में छिपे समुन्दर से 
जाओ !
तुम्हारे जाने का समय है । 



Tuesday, May 05, 2015

तू आग देती रहना

सन्नाटा चुभता है कानों में 
बालियाँ भी 

रात है अँधेरा यहाँ 
उजाला भी 

नल खुला है 
आवाज़ है 
डर गिरता है बाल्टी में 
पीता भी हूँ 
नहाता भी 

मेरी एक दुनिया है 
तुझसे भरी 
तुझसे फ़ना 

ठंडक है 
तू आग देती रहना ।