सर्द होती संवेदनाओं के नाम
इस शाम
देता हूँ पैग़ाम
कहीं बहुत दूर से आती
कानों में पड़ती है एक हँसी
किसकी !
क्या जानूँ ?
एक अद्भुत रहस्य की तरह घटी तुम ।
माज़ी की सारी परतें चीरते हुए
तुम तक पहुँचने की कोशिश करता हूँ
सफल।
ग़ायब होती जाती हो हर जगह से
जबरन गिराई गई एक इमारत की तरह
ध्वस्त होते हैं सब रास्ते
जिन पर चले थे चार पैर साथ
और उँगलियाँ गुँथे दो हाथ ।
बुझ चुकी लौ के नाम
रौशनी बिन
लौ और दीये
दोनों का क्या दाम !
अब अँधेरा घिरता आता है यहाँ
खिड़की में छिपे समुन्दर से
जाओ !
तुम्हारे जाने का समय है ।
इस शाम
देता हूँ पैग़ाम
कहीं बहुत दूर से आती
कानों में पड़ती है एक हँसी
किसकी !
क्या जानूँ ?
एक अद्भुत रहस्य की तरह घटी तुम ।
माज़ी की सारी परतें चीरते हुए
तुम तक पहुँचने की कोशिश करता हूँ
सफल।
ग़ायब होती जाती हो हर जगह से
जबरन गिराई गई एक इमारत की तरह
ध्वस्त होते हैं सब रास्ते
जिन पर चले थे चार पैर साथ
और उँगलियाँ गुँथे दो हाथ ।
बुझ चुकी लौ के नाम
रौशनी बिन
लौ और दीये
दोनों का क्या दाम !
अब अँधेरा घिरता आता है यहाँ
खिड़की में छिपे समुन्दर से
जाओ !
तुम्हारे जाने का समय है ।
No comments:
Post a Comment