Tuesday, December 30, 2014

हम कितने घर जैसे थे न

एक-दुसरे को पाल पोस कर बड़ा करने वाले प्रेमी 
छूट जाया करते हैं । 

जहाँ हो 
मुझसे ही हो कर तो गुज़री हो वहाँ तक 
जहाँ हूँ 
तुमने ही तो ऊँगली पकड़ कर पहुंचाया है 

अब जी लेते हैं 
उन बच्चों की तरह 
जो सयाने हो कर निकल पड़ते हैं घरों से 
या घरों से निकल कर हो जाते हैं सयाने 

सीखते हैं जीना 
नए साथियों के साथ 

हम कितने घर जैसे थे न !

जो तुम दे गई हो

1) जो तुम अधूरा छोड़ गई हो 
     उम्र गुज़रेगी उसे समेटने में 
     मैं भुगत रहा हूँ 
     तुम्हारे प्रेम को । 

2) अतीत के गर्भ में 
    जाने कितनी मारक यादें 
    क़तार में खड़ी हैं 
    तब जितनी सुंदर 
    अब उतनी भयावह । 

3) तुम्हारा मेरा प्रेम मिलन रहा ही नहीं 
    विरह ही रहा 
    और अब रहेगा विरह ही अंत तक 
    मेरे लिए । 

4) वो मधुर शब्द जो तुमने उससे कहे होंगे 
    वही होंगे जो कभी तुमने मुझसे कहे थे 
    हमारी प्रिय धुनों पर अब 
    तुम उसके साथ झूमोगी । 

5)  मैं भी किसी दिन किसी और 
     लड़की के साथ होऊँगा 
     यही दस्तूर है ना 
     पर क्या तब भी तुम यूं ही 
     भरी होगी मेरे अंदर 
     यह तो धोखा होगा ना ?

6) मारने के भी 
    कुछ तो क़ायदे होते होंगे 
    पहले दुश्मनी की जाती है पगली 
    यूं ही थोड़ी .... 
    

उसने पलट कर मुझे इतने दुःख दिए

सुनो 
मरना नहीं है,जीना ही है 
मारना भी नहीं है 
बचाना है सब कुछ 
और इतनी समझ तुम में ही है 

मैंने किसी को बहुत दुःख दिए 
उसने पलट कर मुझे इतने दुःख दिए
कि मैं लायक नहीं रहा उसे और दुःख देने के 
मैं कभी उसके रोने पर उसके पास नहीं गया 
अपने रोने पर बार-बार गया 
कैसे कब भूल गया 
वो भी रोती तो होगी 

पहले सब कुछ कितना अच्छा होता था 
और अब कितना चाह कर भी वैसा नहीं हो पाता 
वो सारी तस्वीरें बस यूँ ही टूट जाएँगी 
आँखों में रह जाएँगी 
बार-बार याद आने के लिए 

पर तुम मेरी तरह मत होने देना 
जैसे मुझे नकारा गया है 
और किसी के साथ ना हो ऐसा 
तुम्हारे खुद के साथ भी नहीं 

मैं समझ गया हूँ 
कि मुझसे ज़रुरी भी कुछ है 
वो है 
जो सबसे अकेली होते हुए भी 
मुझे संभाल रही थी 

पर अब मैं हूँ 
और सुनो 
पहली बार मैं 
तुम्हारे लिए नहीं लिख रहा हूँ ।  

Monday, December 29, 2014

ऐसा क्या निकल जाता है ?

तुम्हारी याददाश्त चली गई थी 
या आँखों से मुझे पहचान लेने की ताक़त । 

किसी ने तुम्हें मारा था क्या ?
सिर में चोट आई थी क्या ?
मुझे बताती 
मैं बचाता 
नहीं बचा पाता तो 
मैं भी मार खा लेता 
चोट लगती मेरे भी सिर में 
चली जाती मेरी  याददाश्त 
या आँखों से तुम्हें पहचान लेने की ताकत । 

ऐसा क्या निकल जाता है ?
मेरे अंदर से क्यों नहीं निकलता ?

इससे ज़्यादा की गुंजाइश अभी ईश्वर ने नहीं बनाई

अब सब ठीक है हमारे बीच 

अब 
नहीं है कोई मन-मुटाव 
नहीं होती किसी भी बात पर कोई लड़ाई 
नहीं दुखाता कोई किसी का दिल 
नहीं होती कोई मस्ती वाली झड़प 
नहीं हँसता कोई किसी बात पर 
नहीं रोता कोई किसी बात पर 

अब 
कोई उम्मीद नहीं बाकी 
ख़त्म है सब 
न मुझे कोई इंतज़ार है 
न तुम पर कोई बोझ 
बस एक अतीत है 

अब 
सिर्फ़ एक ट्रेन आती-जाती है 
उसमें बैठकर कोई नहीं आता-जाता 
कुछ सड़कें भूल चुकी हैं अपना रास्ता 
कुछ बाँहें भूल चुकी हैं अपनी आत्मा 

अब 
जब सब ठीक है तो 
ख़त्म हो चुके हैं फ़ासले भी 
इससे ज़्यादा नहीं बढ़ेंगे 
अब कोई नहीं पहचानता किसी को 
यह तो कुछ कुछ मृत्यु जैसा है 
खुश रहना कितनी बड़ी मजबूरी है देखो 

अब 
और नहीं बिगड़ेगा कुछ 
इससे ज़्यादा की गुंजाइश अभी ईश्वर ने नहीं बनाई 
अब सब पूरी तरह शांत है 
सिवाय मेरे दिमाग़ के ।  

Saturday, May 17, 2014

एक युग तो बीत गया

जब भरोसे जैसे शब्दों की
अहमियत बची होगी
छल-कपट जैसे शब्दों के भी
कुछ मायने होंगे
किसी और सदी में
सतयुग से भी सच्चे  
किसी और युग में
हम करेंगे प्रेम ।


इसी तरह
हम कुछ महीनों के अंतर
में जन्म लेंगे
मैं बचपन से होऊंगा तुम्हारे साथ
तुम्हें समझने के लिए
मैं मान जाया करूँगा तुम्हारे
एक बार मनाने से
तुम्हें भी मौका मिलेगा
रूठ जाने का
जब मैं करने लगूंगा कुछ काम
और तुम डरना छोड़ दोगी
हम करेंगे प्रेम ।


जब हम पी पाएँगे
एक दूसरे की पीड़ा
लिपट सकेंगे
जब मन चाहे
शहर और काम
नहीं कर पाएंगे हमें दूर
जब खुली सडकों पर
बेबाकी से घूम पाएंगे

कर पाएंगे अपने नामों के
मतलब को सार्थक
हम करेंगे प्रेम ।
जब तुम निभा चुकी होगी
सारी ज़िम्मेदारियाँ
और मैं बिता चुका होऊँगा
एक पूरा एकांत भरा जीवन
हम जानेंगे
साथ रहना कैसा होता है
मुझमे होगी इतनी समझ
कि मैं रहूँगा आस-पास
तुम्हें चले जाने से बचाने के लिए  
नहीं लिखनी पड़ेंगी
मुझे रोते हुए कविताएं
हम करेंगे प्रेम ।


कि एक युग तो बीत गया
तुम्हारे मेरे प्रेम का ।  

Wednesday, May 14, 2014

खुद ग़ैर हूँ ,आज खुद से बचाता हूँ


कभी तुझ को बचाता हूँ,कभी खुद को बचाता हूँ
        जाने कैसे मैँ मेरे अंदर इश्क़ की लौ बचाता हूँ

        मुद्दतों से लुटता ही आया है तेरा शहर
        मैं तो मेरी ढाई साल की दिल्ली बचाता हूँ

        हलक़ पे अटका रहे नाम,ज़ुबाँ पे न आएगा  
        जा मैं तुझे बेवफ़ाई के असर से बचाता हूँ

        तेरी हँसती आँखों ने जान रूलाया है बहुत
        मैं फिर भी तुझे मेरी दुआओं में बचाता हूँ
        
        तुझे ग़ैरों से बचाना फ़र्ज़ था मेरा  
        खुद ग़ैर हूँ ,आज खुद से बचाता हूँ
        

Tuesday, May 13, 2014

मेरे नाम के साथ तुम उन्हें कैसे ले कर जाती

“प्रेमचंद की सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ”
           तुम्हारी लिखाई में अंकित
           तुम्हारा नाम और पुस्तक मेला 2012
           तुम्हारा नाम भी वो जो उस समय
           तुम खुद को मुझ से जोड़ कर सोचा
           और लिखा करती थीं
           ऐसी बहुत किताबें हैं मेरे पास
           जो मैं छुपा देना चाहता हूँ


           कितना ज़रूरी होता है ना छुपाना
           हमसे बेहतर कौन जानेगा
           मैं कभी उन किताबों पर अपना नाम
           नहीं लिख पाया जो मैंने तुम्हे दीं
           मेरे नाम के साथ तुम उन्हें कैसे ले कर जाती
           घर
           हमें छुपाना था ना


          तस्लीमा नसरीन की “दुखियारी लड़की”
          देते हुए फ़ेमिनिज़्म के बारे में कहा था तुमने
         वो मैने अभी तक नहीं पढ़ी
         उस दुखियारी लड़की में अब तुम दिखोगी क्या ?
         
          हम
         अनाथ प्रेमी थे
         लाचार समय में


         प्रेम को छुपाना क्यों पड़ता है
         ख़ैर,
         तुम्हारी लिखाई बहुत अच्छी है |


वह सारे बोध जो तुम्हे हुए

तुमने मारा नहीं है मुझे
   जन्म दिया है
   हर बार
   जब लगा मुझे
   और लगवाया मैंने तुम्हें
   कि मार रही हो तुम
   यही है इकलौता सच
   वह सारे बोध जो तुम्हे हुए
   मुझे होने थे
   तुमने बोया प्यार
   मैंने डर

जब तुम्हारा समाज हिम्मत जुटा लेगा

जो जानवर हो गया है
   या चुप बंद कमरे में
   डर कर सो गया है
   उसके पीछे एक कहानी है
   जब तुम्हारा समाज हिम्मत जुटा लेगा
   इन कहानियों को सुनने की
   तब
   बंद हो जाएँगी हत्याएँ
   बंद हो जाएँगी

   आत्महत्याएँ ।

साथ

हमें तब तक हंसना था जब तक
   ज़बरदस्ती कोशिश करने कर भी
   हँसी ख़त्म हो चुकी होती
   हमें तब तक रोना था जब तक
   आँखों में आँसू और गले का रूँधना
   ख़त्म हो चुका होता
   इतना तो होना था
 
साथ  |

तुम मुझे यूं मार कर गिरा दोगी

और मुझे एकदम से याद आया
   जबकि मैं कुछ सोचना नहीं चाह रहा था
   मैं अब कुछ सोचना नहीं चाहता
   कि मेरे पास मेरे बचपन की एक ही फ़ोटो थी
   और मैं उसमें ऐसा सीधा दिखता था कि
   तुम मुझे यूं मार कर गिरा दोगी
   तुम अपनी बचपन की फ़ोटो में भी
   बहुत चंट दिखती थीं
   मार कर गिरा देने वाली बात
   तुमने ही तो कही थी
   इस बात पर हम कुछ देर हँसते रहे थे
   मुझे वह दोनों फ़ोटो याद आती हैं
   और एक पर्स भी  
   अब मैं कुछ सोचना नहीं चाहता
   लेकिन तब
   मैं अपने और तुम्हारे बचपन में लौट जाना चाहता था
   तुम्हारे साथ बड़ा होना चाहता था
   उस घर जाना चाहता था
   जहां तुम बार बार अकेली चली जाती हो
   तुम्हारे साथ स्कूल जाना चाहता था
   पैदल चलते हुए आगे निकल कर,रुक कर,पीछे मुड़ कर
   तुम्हारा इंतज़ार करना चाहता था

   तुम्हें तो याद होंगे वह रास्ते
   मैंने तो कभी देखे ही नहीं
   तुम्हें अपने घर ले जाना चाहता था
   जिधर जाने वाली ट्रेन में तुम मुझे छोड़ने स्टेशन तक आती थी
   हम दोनों दूर तक पटरियों पर नज़र दौड़ाते थे
   मुझे दिखता था मेरा घर
   तुम्हें मेरा बीता हुआ समय

  कितना समय निकल गया था
  जो हमने साथ नहीं बिताया था
  कितना समय आना बाकी है
  जो हमें साथ बिताना था  
  वो फोटोज़ बड़ी हो गयीं हैं
  बूढ़ी भी तो होंगी
  पर अब उनकी कोई बात नहीं होती |

छोटी सी ही तो बात है


तूने कलाईयों के कंगन बदले हैं शायद
     आँखों का काजल पोंछा है शायद
     या आँखें ही बदल ली होंगीं
     तूने तारीखें बदली हैँ  
     कानों में पड़ने वाली आवाज़ बदली है
     बिस्तर की वो सिलवटें बदली हैं
     या वो चादरें फूँक दी होँगी
     
     बहुत शौक है न तुझे
     सिरे से नकार देने का
     प्रेम को
     तीन वर्षों को
     फाड़ कर फ़ेंक देने का उन तोहफों को
     जिनको कभी सीने से लगाये फिरती थी
     और नाज़ करती थी प्रेम पर
     सिर्फ लगाव भर नहीं था
     घरेलू संस्कार ?
     
     …………
     चुभने वाला सच कहूँ ?
     छोटी सी ही तो बात है
     तूने लड़का बदल लिया है ।  

Wednesday, April 02, 2014

मैं खा लेता हूँ एक मीठा पान

मैंने सीखा था प्रेम में होना
     अब मैं सीख रहा हूँ
     प्रेम में ना होना |
     मैं चुन रहा हूँ उन पलों को
     जो याद रखने हैं
     जिनमें तुम निष्ठुर थीं
     भुला रहा हूँ वह समय
     जो जोंक की तरह चिपक गया है
     मेरे माथे से
     जो घुस गया है मेरी आँखों में
     जिनमें तुम और मैं थे
     मैं अंतर नहीं कर पा रहा हूँ |

     पलट कर यूँ ही तुमसे कुछ पूछ
     लेने का मन करता है
     फिर याद आ जाता है
     अब सिर्फ मैं ही हूँ
     तभी यहाँ किसी सड़क पे
     दिख जाता है पान का खोखा
     मैं खा लेता हूँ एक मीठा  पान
     पर अब पहले की तरह उगल नहीं देता
     निगल लेता हूँ
     स्वाद कभी वैसा नहीं होता
     कभी खुद ही अपनी आँखों में लगा लेता हूँ काजल
     और देख लेता हूँ दोनों को आईने में
     चाँद जो तुमने देखना सिखाया था
     उम्र भर अकेले ही देखना होगा
     यह टीस मुझे फिर लौटा लाती है
     जहाँ से मैं रोज़ थोड़ा भागना चाहता हूँ |

     अब तुम कुछ भी मेरे लिए नहीं करती
     काश थोड़ी ग़लतफहमी तो मेरे हिस्से
     छोड़ दी होती    
     प्रेम कितना दूर ले आया है
     तुम्हें नहीं मुझे
     जानता हूँ
     तुम इस तरह नहीं सोच पाओगी ।  
              

      

Tuesday, April 01, 2014

मैं किरकिरी ही सही चुभता रहूँगा उम्र भर


कब तक ज़ुबाँ को सलीके में रखा जाए 
जो हुआ उसे धोखा मान ही लिया जाए

बहुत अरसा हुआ आज नाराज़गी पनपी है

मैंने ही पाले थे भरम मान ही लिया जाए
         
मैं किरकिरी ही सही चुभता रहूँगा उम्र भर
तेरी आँखों से कोई और बहेगा मान ही लिया जाए


चाहा था समझते रहें एक-दूसरे को हमेशा
तूने समझ ली है दुनिया मान ही लिया जाए

Saturday, March 22, 2014

कल किसी और के लिए

लिखे हुए शब्द
   बोली गयीं बातें
   जिन पलों का कोई साक्षी नहीं होता
   ऐसे बिताये हुए पल
   मौन और स्थिर तस्वीरें
   बहुत सारे पैदल रास्ते
   बहुत कुछ बचाने को
   रोज़ रोज़ किया हुआ
   ज़रा ज़रा सा संघर्ष
   और भी तो
   कितना कुछ
   सब व्यर्थ है
   अर्थ है तो सिर्फ
   एक ख़ूबसूरत एहसास का
   जिसकी नियति है
   बदलते जाना
   आज किसी के लिए
   कल किसी और के लिए
   परसों शायद…….