Monday, December 29, 2014

इससे ज़्यादा की गुंजाइश अभी ईश्वर ने नहीं बनाई

अब सब ठीक है हमारे बीच 

अब 
नहीं है कोई मन-मुटाव 
नहीं होती किसी भी बात पर कोई लड़ाई 
नहीं दुखाता कोई किसी का दिल 
नहीं होती कोई मस्ती वाली झड़प 
नहीं हँसता कोई किसी बात पर 
नहीं रोता कोई किसी बात पर 

अब 
कोई उम्मीद नहीं बाकी 
ख़त्म है सब 
न मुझे कोई इंतज़ार है 
न तुम पर कोई बोझ 
बस एक अतीत है 

अब 
सिर्फ़ एक ट्रेन आती-जाती है 
उसमें बैठकर कोई नहीं आता-जाता 
कुछ सड़कें भूल चुकी हैं अपना रास्ता 
कुछ बाँहें भूल चुकी हैं अपनी आत्मा 

अब 
जब सब ठीक है तो 
ख़त्म हो चुके हैं फ़ासले भी 
इससे ज़्यादा नहीं बढ़ेंगे 
अब कोई नहीं पहचानता किसी को 
यह तो कुछ कुछ मृत्यु जैसा है 
खुश रहना कितनी बड़ी मजबूरी है देखो 

अब 
और नहीं बिगड़ेगा कुछ 
इससे ज़्यादा की गुंजाइश अभी ईश्वर ने नहीं बनाई 
अब सब पूरी तरह शांत है 
सिवाय मेरे दिमाग़ के ।  

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