बुझती लौ की छटपटाहट से उबरने को …
यह सब ख़ुद को बचाने का एक तरीका है बस। प्रदीप अवस्थी का तरीका । इसे पागलपन भी कहा जा सकता है।
Wednesday, November 24, 2010
एक ख्वाब
ख्वाब देखना मेरी फितरत है
उनका टूट जाना शायद मेरी किस्मत है
पर मै देखता जाऊँगा
गिरूंगा पर फिर उठूँगा
और बढ़ता जाऊँगा
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