Sunday, January 01, 2012

हैप्पी न्यू ईयर

जापान में रिफ्टर पैमाने पर की तीव्रता का भूकंप, इम्फाल में ग्रेनेड हमला और कोलकाता में एपीजे हाउस में आग | कुछ इस तरह स्वागत हुआ है नए साल का |

 नया साल की हार्दिक शुभकामनायें | वाकई क्या यह नया साल है ? और शुभकामनायें किस बात की भई ? क्या कुछ चमत्कार होने वाले हैं ? क्या सूरज अपनी रफ़्तार कम या ज्यादा कर देगा ? क्या वो अपनी रौशनी घटा या बढ़ा देगा ? क्या इस साल इन्द्रदेव धरतीवासियों से रुष्ट या उनपर प्रसन्न नहीं होंगे ? क्या उनका प्रकोप बाढ़ या सूखे के रूप में सामने नहीं आएगा जो एक तरफ तो उड़ीसा, बिहार और उत्तर प्रदेश के जिलों में लोगों को डुबाता है और दूसरी तरफ झारखण्ड और पश्चिम बंगाल में सूखे की मार झेल रहे लोगों को और दयनीय बनाता  है ?
                                                                                            क्या इस साल हम नए संकल्प नहीं लेंगे जिन्हें बाद में तोड़ते हुए हमें न दुःख होगा न अफ़सोस ? क्या फेयर एंड लवली सात हफ़्तों में गोरा कर पायेगी ? क्या हम पुलिस से डरना बंद कर पाएंगे ? क्या सिगरेट पीने वाले इसे पीना छोड़ पाएंगे ? सिगरेट पीने से हर साल लगभग 5 लाख लोग मरते है क्या इस बात पर वो कभी तवज्जो दे पाएंगे ? क्या सार्वजनिक शौचालय न होने की वजह से लोगों को खुले में शौच करने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ेगा ? क्या अजमल कसाब को सज़ा मिल पायेगी ? क्या इरोम शर्मीला कि मांगे मान ली जाएँगी ? क्या कश्मीर की समस्या हल हो पायेगी ? क्या इस साल हमारा भारत विकासशील देशों की सूची से निकल कर विकसित देशों की सूची में शामिल हो पायेगा ? क्या लोकपाल बिल पास हो पायेगा ?
                                                                      क्या जब चार पुराने दोस्त बहुत समय बाद मिलेंगे तो उनकी बातों में स्कूल या कॉलेज के समय की लड़कियों की बातें नहीं निकल आएँगी ? क्या आशिकों के दिल नहीं टूटेंगे ? क्या प्यार के मायने कुछ बदल पाएंगे जहां हर इंसान को अपना साथी स्वयं चुनने की पूरी आज़ादी मिल पाए ? वो समाज जो प्यार को महान कहते नहीं थकता क्या वो दो प्यार करने वालों को इतनी आज़ादी दे पायेगा की वो स्वेच्छा से जी सकें ? वो समाज जो प्यार को पवित्र एहसास मानता है क्या कभी प्यार करने वालों को नासमझ, बेवकूफ या ग़ैर-ज़िम्मेदार से ज्यादा कुछ समझ पायेगा ? क्या ऐसा समय इस साल आ पायेगा की उन्हें दुनिया की नज़रों से बचकर न मिलना पड़े ? ग़लत न होते हुए भी क्या वो इस भावना से बच पाएंगे जैसे वो कुछ ग़लत कर रहे हों ?
                                                          क्या रिश्ते धर्म और ज़ात देखकर तय नहीं होंगे ? किसी खाप या पंचायत के फैसले पर प्रेमी युगलों को मारा नहीं जायेगा ?
                                                                                                                     क्या युवाओं के सामने ऐसी परिस्थितियाँ नहीं पैदा की जाएँगी जिससे उनके मन में अच्छाई के प्रति घृणा पैदा हो और क्या उन्हें तरह-तरह के प्रलोभन देकर भटकाया नहीं जायेगा ? क्या हमें अपने मन की बातें ज़ाहिर करने से नहीं रोका जायेगा ? क्या कम मौके होने की वजह से बिहार और उत्तर प्रदेश के गावों से जवान लड़के-लड़कियों को इस आस में अपना घर छोड़कर दिल्ली या मुंबई नहीं जाना पड़ेगा कि वो खुद तो जैसे-तैसे रह लेंगे पर हर महीने अपने गाँव में परिवार के लिए कुछ पैसा जरुर भेज पाएंगे ? यही लोग इन बड़े शहरों में गगनचुम्बी इमारतें बनाते हैं,आपके लिए रिक्शे चलाते हैं | क्या ऊँची-ऊँची इमारतों वाले ये शहर इनको खपा पाएंगे ? क्या दिल्ली को दिल्ली और मुंबई को मुंबई बनाने वाले मजदूरों को इन शहरों में रहने के लिए सम्मानजनक सुविधाएं मिल पाएंगी ? क्या एक तरफ तो बड़े-बड़े गोदामों में लाखों टन अनाज सड़ेगा नहीं और वही दूसरी तरफ भूख से लोग मरेंगे नहीं ?
                                                                                                      क्या हम यह समझ पाएंगे कि हमें फ़ॉर्मूला वन से ज्यादा जरुरत ठंड में सिकुड़ते लोगों के लिए छतों कि है ? क्या सर्दी की रातों में अपने हीटर लगे कमरों में रजाई ओढ़कर आराम से सो जाने वाले लोग अपनी सोच को उस आराम और अपने कमरों में रखे टीवी से बाहर लाकर, 2 -3 डिग्री सेल्सिअस में बाहर खुले में बिना एक कम्बल के ठिठुरने वाले लोगों के बारे में सोच पाएंगे ? क्या सुबह चाय के साथ अखबार पढने वाले लोग "कल रात ठंड से दस और मौतें" शीर्षक वाली खबर को पढ़कर ये समझ पाएंगे कि ये खबर बीती रात उन्ही ठिठुरने वाले लोगों के बारे में है ? क्या सड़क पर जीवन बिताने वालों के लिए खाने कि चीज़ें उतने ही मूल्य में उपलब्ध हो पाएंगी जितने मूल्य में हमारे देश की लोकसभा की कैंटीन में नेताओं के लिए उपलब्ध होती हैं ? क्या हमें यह पता लग पायेगा की हमारा पैसा जो सरकार हमसे टैक्स के रूप में लेती है उसका इस्तेमाल कहाँ और कैसे होता है ?
                                                              क्या मेरे और आप जैसे खुशकिस्मतों की नज़र उन बच्चों पर कभी जाएगी जो 12 साल की उम्र में इसलिए काम कर रहे हैं क्योंकि उसके पिता नहीं हैं, माँ अकेले खर्च नहीं उठा पाती और उसे अपने छोटे भाई-बहनों को पालना पड़ता है ?क्या इसी तरह से कुछ बच्चों से उनके पढने का हक़ नहीं छीना जायेगा ? क्या इस साल डायरिया और निमोनिया जैसी बीमारियों से,जिनका इलाज संभव है 20 लाख बच्चे नहीं मरेंगे
                                                                  फिल्मों की बात करें तो क्या इस साल कम लागत वाली फिल्मों को वो इज्ज़त मिल पायेगी जो उनका हक़ है ? क्या साउंडट्रैक,बोल और 404 error not  found जैसी फ़िल्में चर्चा का विषय बन पाएंगी ? क्या सेंसर बोर्ड फिल्मों के आपत्तिजनक दृश्यों और संवादों पर ये देखकर कैंची नहीं चलाएगा कि फिल्म है किसकी और निर्माता-निर्देशक कोई बड़ी हस्ती है या कोई नया है ? क्या इस साल भी हम वही फ़िल्में देखने सिनेमा हॉल जायेंगे जिनमे हमें पहले से पता होता है कि क्या होगा
                                             क्या इस साल भ्रूण में ही लड़कियों को नहीं मारा जायेगा ? क्या कभी एक 6 साल कि बच्ची तो कभी 70 साल की वृद्धा का बलात्कार नहीं होगा ? क्या किसी 3 साल की बच्ची के अंगों से नहीं खेला जायेगा ?क्या इस साल महिला दिवस पर किसी लड़की को गोली नहीं मारी जाएगी ? क्या शादी के बाद दो अजनबियों को एक कमरे में बंद कर देने वाली प्रथा पर हम खुल कर हंस पाएंगे ? क्या कोई उन औरतों की आवाज़ सुन पायेगा जिनके पति उनका बलात्कार करते हैं ?
   क्या इस साल या फिर कभी किसी अगस्त में ऐसा जन सैलाब उमड़ पायेगा जो देश के कोने-कोने से रामलीला मैदान तक पहुंचेगा ? क्या ऐसे लोगों के लिए जो खुद अपने लिए कुछ नहीं करना चाहते कोई अन्ना फिर खड़ा हो पायेगा? क्या उन "सात बहन" कहलाये जाने वाले राज्यों की हालत कुछ बदल पायेगी जहां लोग ये नहीं समझ पाते कि वो आखिर किस देश में रहते हैं ? जहां कभी कुकी जाति के लोग अपनी किसी मांग को लेकर 120 दिन के लिए राष्ट्रीय राजमार्ग रोक कर मणिपुर को बाकी देश से काट देते हैं तो कभी इसके जवाब में नागा जाति के लोग भी ऐसा ही करते हैं
               क्या हमारे देश में इस साल कोई आतंकवादी हमले नहीं होंगे ? क्या ज़ात और सियासत के नाम पर कुछ और लोगों का खून नहीं बहेगा ? क्या हमारी न्यायिक प्रक्रिया कुछ तेज़ हो पायेगी ?क्या दाढ़ी रखने वालों को आतंकवादी नहीं समझा जायेगा ?क्या दंतेवाड़ा जैसे नरसंहार फिर नहीं होंगे ? क्या देश को संगठित रखने की कोशिशों में और लोग नहीं मारे जायेंगे ?
                                                             क्या हम और समझदार हो कर अपने अधिकारों की मांग कर पाएंगे क्या आम जनता से जुड़े मुद्दों का राजनीतिकरण होना बंद हो पायेगा ? क्या हमारे देश की संसद में बैठे आपराधिक रिकॉर्ड वाले नेताओं की संख्या कुछ कम हो पायेगी ? क्या हमारे चुने हुए जन प्रतिनिधि हमारी समस्याओं को जान भी पाएंगे ? क्या सरकार और उसकी नीतियों के खिलाफ बोलने वालों को राष्ट्र के खिलाफ बोलने वाला नहीं समझा जाएगा ?
                                      क्या इस साल रोज़ सडकों पर लोगों की जानें नहीं जाएँगी ? क्या इस साल और सपने नहीं टूटेंगे ?
                                             मुझे तो ये सारे सवाल कचोटते हैं | इन सवालों के जवाब अगर मिल पाएं तो आपको भी ये नया साल मुबारक |