Friday, December 27, 2013

जो बच सकता है

जो आज था वही कल रहा है
वह मर गया जो फसल रहा है


सर्दियों में हाथ तापने बैठा था  
कैंप में एक बच्चा जल रहा है


आप रहते होंगे समाज में
वहाँ जंगल ही चल रहा है


सियासत में मरे हैं उनके भी
जिन बच्चों का गुल्ली-डंडा चल रहा है


कोई वापस स्कूल भेज दो उनको
देखो तो बचपन गल रहा है


आंकड़ों के खेल में इनके
जो बच सकता है वो टल रहा


इतिहास में झाँक कर देखो
सियासत का यही फल रहा है ।

Tuesday, December 24, 2013

किसी ने दिया था हर पल का वास्ता

क्या हवाओं में ही घुल गया है दर्द
आँखों को कोई और काम नहीं मिलता

लोग मिलते हैं यहाँ अय्यारों की तरह
बात करने को हमजाम नहीं मिलता

धूप-छाँव की तरह बदलता है मिज़ाज
भटकते ख्यालों को अंजाम नहीं मिलता

मुकम्मल जहां,ज़मीन,आसमान की बात छोड़ो
तबीयत पूछने को ख़ास-ए-आम नहीं मिलता

किसी ने दिया था हर पल का वास्ता
यूं ही तो कोई सुबह-शाम नहीं मिलता





Monday, December 23, 2013

जंगल ख़त्म हो रहे हैं......

कर तो लोगे प्रेम 
निभाओगे कैसे ?
अपने ही पहरेदार बन कर बैठ जायेंगे 
तुम्हें बंद कमरों में पीटा जायेगा 
तुम्हारी ज़ात तय करेगी तुम्हारा भविष्य 
तुम्हारी जेब का भार तय करेगा तुम्हारी इज्ज़त 
तुम्हारे परम-पूज्य पिताश्री-माताश्री 
(मुख्यतः पिताश्री,माताएं अक्सर मूक होती हैं)
तय करेंगे की तमाम उम्र 
हर रात तुम्हें किसके सोना है 
उस कमरे के बाहर भले लोगों का समाज होगा
अंदर
एक जंगल होगा
ऐसे जंगल का तिरस्कार करोगे
तो कानून भी है तुम्हारे लिए
पेड़ की टहनी पर रस्सी का एक सिरा
दूसरा दो गलों में
घुटेगा दम
हवा में निर्जीव होंगे
चार पैर ....
और यह होगा जंगल का इन्साफ ...

समाज पनप रहा है जंगल ख़त्म हो रहे हैं......

Sunday, December 22, 2013

ग़र रहते हम दोस्त

तुम हमारे घर आते हम तुम्हारे घर आते
ग़र रहते हम दोस्त तो मस्ती से जी पाते


इतनी सारी बंदिशें इश्क़ साथ लाएगा
ऐसी ग़ुलामी में बोलो कब तक जी पाते
न भटकना पड़ता यूं दूसरों के दर पर
खुद से इश्क़ करने का ग़र हुनर जान पाते


एक सिरा खुद लेकर दूसरा तुम्हें थमाया था
जितनी बार तुमने गिराया काश उतनी बार उठा पाते


प्यार के गीतों से फिर आँखें नम हुई हैं
तुम्हारे पास आने की छटपटाहट उम्र भर रोक पाते


ओ रहबरों एक बस्ती दिलजलों की बसा देते
भूल अपना "मैं" सब इश्क़ के किस्से सुना पाते


Friday, December 20, 2013

मैं रेगिस्तान में मरूँगा

जब लौट कर जाना ऐसा हो जायेगा
जैसा वर्जित होना होता है
जैसे घर हो जाते हैं
माँ वहीँ रहती है
जैसे प्रेमी हो जाते हैं
हर बात पे झगड़े के बाद या  
लम्बी चुप्पी के बाद
अगर तब लौटे ?
कायरता और धैर्य को
एक तराजू में तौला जायेगा क्या ?
प्यार और कमज़ोरी को भी ?
समझ धोखा दे ही देती है
कोई पीछे भागता है
कोई स्थिति से
अगर है कुछ मन में
तो झाँका जाना चाहिए मन में
इतने प्यारे लोग निर्दयी क्या सच में होते हैं ?
अनकही बातों का अपराध-बोध
मुझे भी छीलता है
कसौटी पर मुझे खरा उतरना था
तुम्हें क्यों नहीं ?
तुमने भी किया था
तुम्हें भी मारेगा ...

और मैंने अपने मरने की जगह
चुन ली है
मैं मरूँगा वहाँ जहां
आस होगी
प्यास होगी
रेत होगी
जहां रेगिस्तान होगा
हाँ मैं रेगिस्तान में मरूँगा
सुनो
किसी एक साल तुम्हें झमाझम बरसना होगा

लोग कहते हैं
रेगिस्तान में बारिश नहीं होती |

Saturday, December 14, 2013

हारो मत

आओ,देखो
मेरे पास बैठो
देखो मुझे
मेरे चेहरे को
मेरी आँखों को
पहचानो
मेरी आस को
मेरी प्यास को
तुम्हारे पास ही हल है
झंझटों से ऊपर उठो
यह आज हैं कल नहीं रहेंगी
सब कुछ हमारे ही हाथ में है
समय कहीं निकल न जाए
मैं मर न जाऊं
किस फेरे में पड़ी हो
क्या सोच रही हो
सही-ग़लत
खोया-पाया
मिला-किया
यह आंकलन कहीं तो जाके रुके
दिल,मन ,एहसास ,प्यार सब मायने रखता है
इंसान भी तो मायने रखता है
जीवन भी तो मायने रखता है
लड़ो सही बात के लिए
हारो मत

मत हारो ।

Wednesday, December 11, 2013

त्याग-पत्र



मैं लांघ आता हूँ
यह समुंदरों का शहर
बार-बार कि
प्रेम साहस बन सके
लम्बे अरसे से बंद
किवाड़ें खुल सकें

खुल कर जीना
और प्रेम में खुल कर जीना
यह दोनों बातें अलग क्यों हैं ?कैसे हैं ?
कौन हैं यह लोग जो
यह अंतर पैदा करते हैं ? क्यों ?
निर्मम और निर्दयी
यही शब्द याद आते हैं

प्रेम के नाम पर दुनिया चलाने वाले
दुनिया में प्रेम नहीं चलने देते

उचित समय और समझ की दुहाई
हमें मत दीजिये
कोई कुछ सीख कर नहीं आता
अपने खुद के गढ़े सुख,दुःख और अनुभव से
गुजरने की इच्छा क्या ग़लत है ?
हाँ तुम आज़ाद हो
लेकिन हम नहीं हैं
"मैं" और "तुम" एक ही है
लेकिन "हम" अलग है

क्या एहसासों को समय-सीमा में बाँधा जा सकता है ?
क्या कोई काल निश्चित किया जा सकता है प्रेम के लिए ?
क्या यादों और ख्यालों को मस्तिष्क के किसी कोने में
बंद किया जा सकता है ?

अचार,कम्बल,कुर्ते,चाय,खाना
पत्र,आँसू,लड़ाई,भरोसा और इंतज़ार
यह सब वापस लौटाया जा सकता है ?

सुख दुःख होता जा रहा है 

मैं लांघ आता हूँ
यह समुंदरों का शहर
बार बार
कितना अरसा हो गया
तुमसे एक किवाड़ नहीं लांघी जाती

यह अपमान है
मेरा नहीं प्रेम का

सुना है लोग प्रेम-पत्र लिखते हैं
यह भी प्रेम में लिखा गया "प्रेम-पत्र" ही है
स्थिति को समझा जाए और बार बार पढ़ा जाए
तो त्याग-पत्र सा लगता है | 

Thursday, December 05, 2013

हम जी लेंगे सवालों के साथ

बस अब यह जुबां न खुले
और कोई आरज़ू न पले

बेहतर है अब चुप ही रहें
रिश्तों में और गिरहें न डलें

हमारा ज़ेहन है हमारे ख्याल हैं
यह लड़ते रहें आप फूले-फलें

हम जी लेंगे सवालों के साथ
जवाबों की तलाश में कितना जलें

यह न लिखता ग़र मिल जाते
यह दूरी अब और खले 

Wednesday, December 04, 2013

मुद्दों से यह कोसो दूर हैं

चर्चा का बाज़ार गरम है
आज का दिन अपना करम है

पांच साल बाद निकले हैं वह
देखो इनमे कितनी शरम है

हमें लगेगा दम है हम में
समय बोलेगा कितना भरम है

मुद्दों से यह कोसो दूर हैं
राजनीति ही इनका धरम है

पैसे और लाशों का खेल है
देखो आका आज नरम हैं 

ग़म-ए-हिज्र कभी

ग़म-ए-हिज्र कभी तुमको भी हुआ होता
जो हुआ हमारा हाल तुम्हारा भी हुआ होता

घर,मोहल्ला,समाज है और रहेंगे
थोड़ा निडर तुम्हारा प्यार भी हुआ होता

सब समझदार कहते हैं तुमको बहुत
समझ का थोडा हिस्सा मेरा भी हुआ होता

इश्क़ में जितना हुआ है हमारा नुकसान
थोड़ा सा तो तुम्हारा भी हुआ होता 

Saturday, November 30, 2013

सहमे सहमे फिरते थे दो पंछी दिल्ली की सडकों पे

गहरे हैं ज़ख्म वक़्त तो लगेगा भरने में
जी लिए हैं बहुत अब लम्हा लगेगा मरने में

बेहतर था एक गोली में जान निकल जाती
सदियाँ लगेंगी इस तरह की मौत से उबरने में

सहमे सहमे फिरते थे दो पंछी दिल्ली की सडकों पे
नहीं बनती तो छोड़ो यार क्या रखा है डरने में

हम नहीं हारे हैं जीती है ज़ात इंसान की
कहते तो थे तुमको "वो" क्या रखा है इश्क करने में ...

बच्चे मर गए

ख़त्म हुआ अब
कब तक टालें

ज़हर के प्याले
सब मेरे हवाले

लानत दुनिया
मुझ पे डाले

लाल पड़ गए
सब नदिया-नाले

सब हँस के बोले
जा जी ले साले

बच्चे मर गए
खुश हैं घरवाले 

Tuesday, November 26, 2013

कोई इस जगह का नाम बता दे

तुच्छ मैं था नहीं
चुप था
प्रतीक्षा में
अब मुझे लगता है
मानवता के इतिहास में खुद पर
किया जाने वाला सबसे बड़ा ज़ुल्म है
प्रतीक्षा करना

जब आप हँस सकते थे छोटी-छोटी बातों पर
खेल सकते थे घर के छोटे बच्चों के साथ
बना सकते थे माँ के साथ खाना
कर सकते थे बहुत सारे रचनात्मक कार्य
आप प्रतीक्षा में थे
घूम सकते थे अकेले भी
पहाड़ियों पर,बर्फ में,बारिशों में
जला सकते थे दीपक
लगा सकते थे नए पौधे
आप प्रतीक्षा में थे
बांधे जा सकते थे अकेले भी
मन्नत के धागे
पर एक पागलपन लिए थे

और समाज के आगे होना था
नतमस्तक
वही देता था स्वीकृति

न अंदर जाने की इजाज़त
न मुड़कर जाने की हिम्मत
कब तक और कैसे
खड़ा रहे कोई
खुले दरवाज़े पर
कोई इस जगह का नाम बता दे
जहां खड़ा हूँ मैं
यहाँ से कहाँ जाया जाता है ?

Thursday, August 15, 2013

आपको बेवकूफ कहूँगा या अति आशावादी ....

कमाल है यार |लोग बधाइयाँ दे रहे हैं एक दुसरे को |कुछ ख़ास है क्या आज?कहीं तीन रंगों के गुब्बारे लगाये गए हैं,कहीं लोग बहुत मेहनत कर के अपने स्कूलों और संस्थाओं में जश्न कि तैयारी में लगे हैं |यह सब मज़ा-मस्ती तो ठीक है लेकिन आप तो असल में अपनी गुलामी का जश्न मन रहे हैं |जो व्यक्ति प्रेम करने को आज़ाद नहीं है वह प्रेम के गीत गायेगा |जो देश नहीं चला पा रहे वो भाषण देंगे |आप मणिपुर या असम जाइए,कश्मीर जाइए |वह जाकर मत बोल दीजियेगा कि स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई |छत्तीसगढ़ ही चले जाइए |आप भूल गए होंगे की 16 दिसम्बर को दिल्ली में क्या हुआ था या क्या हो रहा है अभी उन रेपिस्ट्स का ?सोनी सोरी आज़ाद है क्या ?या वह नौजवान जो जेलों में ठूंस दिए जाते हैं यूँही |तेज़ाब की खुले आम बिक्री पर प्रतिबन्ध लग गया है शायद |
                            यहाँ तो हर घर,हर संस्था का अपना अलग संविधान है,अपने कानून हैं,वही मानने पड़ेंगे|कोई कहता है इज्ज़त दिल से आती है |अरे भाई किसकी इज्ज़त ?उत्तराखंड में कितना काम कर दिया सरकार ने ?यह तो बूँद और गूँज जैसी संस्थाएं हैं जो लगातार काम कर रहीं हैं |पर हमें अपनी आँखें तब तक मूँद कर रखनी हैं जब तक हमारे साथ न हो जाए |तब तक आप जश्न मानिए,देश आज़ाद है,आप भी | मैं या तो आपको बेवकूफ कहूँगा या अति आशावादी |....

Tuesday, August 13, 2013

कविताओं में किये ब्रेक-अप

समय बोलता गया कि
तुम्हें उदार होना है
मर जाने की हद तक
हार जाना मर जाने से
बेहतर लगा
जो बोला समय ने बोला
कविताओं में किये ब्रेक-अप
जो निकले थे निरंतर नैराश्य से
जितना दहाड़ना
उतना गिडगिडाना
जितने सपने बुनना
उतने दिन जलाना
एक पग बढ़ना
दो पीछे लौट आना
आसान नहीं था कुछ भी
बार बार जाना
लौट कर आना
एक दिन चले जाने के लिए ......

Sunday, August 04, 2013

तुम्हारी मजबूरियों और मेरे अकेलेपन का सामंजस्य बैठ ही नहीं पाया .....

वो दिन नाकामियों और संघर्षों के दिन थे| संघर्ष के दिन तो खैर जब से होश संभाला तब से रहे|ऐसे ही दिनों में मैंने हिम्मत की अपने मन-मुताबिक जीने की| जो मुझे खाने के लिए पैसे देते थे,पहनने को कपड़े देते थे,बचपन से पढ़ाते-लिखाते रहे,उनके विरूद्ध जाने की| जब जब उन्होंने मुझसे उम्मीद की मैंने कह दिया कि मुझे अपने हिसाब से जीना है| मेरी हर बात को मान लेना उनकी सहमति नहीं थी,मजबूरी थी शायद| यह मन-मुताबिक़ ज़िन्दगी मैंने जैसे ही जीनी शुरू की,तुम आ गयीं और कहा कि तुम्हे प्रेम है मुझसे| हालांकि यह मुझे एक उपलब्धि जैसा लगा कि एक लड़की स्वयं मुझसे कहे कि उसे मुझसे प्रेम है| मैंने समझाया कि मुश्किल होगी,तुमने कहा कि हम मिलकर संभाल लेंगे| ठीक है कह कर मैंने तुम्हे गले लगा लिया| मुझे अनुभूति हुई कि हमारा प्रेम महान है,हम महान हैं | उसके बाद दर्द ,पीड़ा,यातना का सिलसिला शुरू हुआ| फिर भी हम साथ बने रहे|एक दुसरे से और परिस्थितियों से लड़ते रहे |यूं दुखी रहकर साथ बने रहना मेरे अंदर महानता के अहसास को दोगुना कर देता था |और हमें यूं ही जीना था| आत्महत्या को कायरतापूर्ण काम कहा जाता था और और ऐसा ही कहने वाले लोग प्रेम की इजाज़त नहीं देते थे | तुम्हारी मजबूरियों और मेरे अकेलेपन का सामंजस्य बैठ ही नहीं पाया| प्रेम तो हमें अथाह था पर समय अनुकूल नहीं था |
         उन दिनों तुम्हारा गुस्सा माँ पर उतरता था |मुझे चिल्लाना होता था तो माँ होती थी | सब कुछ सुनती थी |और जब मुझसे नाराज़ या गुस्सा हो जाती थी तो तुम्हारी तरह दो दिन या सात दिन का इंतज़ार नहीं करती थी |शायद रो लेती होगी थोड़ी देर अपने इश्वर के सामने और पलट कर फ़ोन करती थी और कहती थी कि परेशान मत हो | थोड़े दिन के लिए घर आजा मन हो तो |वह सब कुछ समझती थी पर मैंने कभी उसे समझने की जरुरत तक नहीं समझी कभी |उसके बारे में कभी ऐसा नहीं लगा कि वो मुझे भूल कर अजनबी हो गयी है |उसके प्रति कभी कोई ज़िम्मेदारी नहीं महसूस हुई,यह या तो मेरी मेरी नीचता थी या उसके प्रेम की ताकत |
                                                         नींद में अचानक तुम्हारी यादों को टटोलना,सड़क पर पैदल चलते समय अपनी हथेली में तुम्हारी हथेली कि सिहरन,अपनी आँखों में तुम्हारे चेहरे को धुंधला होने से बचाने कि ख्वाहिश, सुबह उठते ही महसूस हुए पहले क्षण की बदहवासी....अब यही हो तुम |
अधूरा रहना ही नियति है शायद |


Tuesday, May 07, 2013

राजाओं की ज़िन्दगी और दयनीय मौतें

"शूटआउट एट वडाला"फिल्म देखते समय और देखने के बाद यही एक बात थी जो मेरे दिमाग में रह गयी | बात जितनी सीधी है उतनी ही नज़रंदाज़ हो जाने वाली भी | मेरे लिए बहुत आवश्यक है फिल्म को ज़िन्दगी से जोड़कर देखना |कहीं न कहीं हम सब के बहुत अंदर दबी हुई यह इच्छा होती है कि हम पर बहुत अत्याचार हो,हम रोयें,टूटें,हार जाएँ | फिर लड़ें,संघर्ष करें और जीतें | हम खुद वह नायक हो जाना चाहते हैं जो उसूलों का पक्का है,चुपचाप सीधी ज़िन्दगी जीना चाहता है ,जो पढाई करता है,जिसका बाप मर चुका है,जिसको अपनी माँ का ख्याल रखना है और जिसकी ज़िन्दगी में एक लड़की भी है जो कहती है कि वह उससे बहुत प्यार करती है |

हम सब जब अपने घरों से पहली बार बाहर निकलते हैं तो ऐसे ही तो होते हैं-सीधे,मासूम,भोले| बहुत कुछ कर जाना चाहते हैं| बहुत सारे उसूलों की चादर ओढ़ कर निकलते हैं,ऐसे उसूल जिन्हें न तो हम पूरी तरह अपना पाते हैं न छोड़ ही पाते हैं | फिर बाहर निकल कर हम सीखते हैं दुनियादारी,हमें मिलते हैं धोखे,हम देने लगते हैं धोखे| हम सीख लेते हैं चालाक होना | हम सीख लेते हैं बदला लेना | हमें दिखता है खून | हमें चाहिए होता है खून |हम दूसरों के साथ ग़लत होता हुआ देखते हैं और चुप रहते हैं | हमारे साथ ग़लत होता है तब भी चुप ही रहते हैं | लेकिन हमें खींच लिया जाता है कि साले तुम लड़ो और वही बन जाओ जो कभी नहीं बनना चाहते थे |और फिर हम जीते हैं बदले कि ज़िन्दगी |

हमारे हाथों में होती है ताकत,हम जानवरों की तरह लड़ते हैं और मार देते हैं सामने वाले को और बन जाते हैं राक्षस | फिर हम अपनाते हैं तरीके जो भले ही ग़लत हो पर अपने होते हैं |ऐसे में जिनसे साथ की सबसे ज्यादा उम्मीद होती है वही दुत्कार देते हैं क्योंकि उन्हें राक्षस पसंद नहीं | छुट जाता है हमारा प्यार |और हम जितने ताकतवर होते हैं उतने ही बेवकूफ भी |

जहां तक फिल्म कैसी है का सवाल है तो मेरी राय यह है कि एक बार देखी जानी चाहिए | मेरी राय यह भी है की फिल्म देखकर खुद अपनी राय बनायेंगे तो आप एक अच्छे दर्शक भी बन पाएंगे |

फिल्म अभिनय का ज्यादा मौका नहीं देती | तीन आइटम गाने वैसे तो ज्यादा लगते हैं पर अगर गैंगस्टर्स की बात की जाए तो यह शायद उनकी ज़िन्दगी का जरुरी हिस्सा है | इस फिल्म का शूटआउट पिछली फिल्म "शूटआउट एट लोखंडवाला " जितना प्रभावित नहीं करता |यह सच है कि फिल्म में गालियाँ बहुत हैं पर यह भी सच है की यह एक सच है |आप ऐसे गैंगस्टर्स की कल्पना नहीं कर सकते जो गालियाँ न देते हो |  

 इस तरह बर्बाद होती हैं जिंदगियां और हम सबको सब पता होता है लेकिन कोई कुछ कर नहीं सकता | सच की पड़ताल न आज तक कभी हुई है और न कभी होगी | बस जब तक खुद के साथ कुछ नहीं होता तब तक जिए जाना है |किसी ने कहा तो नहीं है मैं ही कह देता हूँ-"मैं ऐसे जीता हूँ जैसे तैयार हूँ मरने के लिए "| 

पर मैं एक बात और सोचता हूँ - मान्या सुर्वे के साथ कुछ ग़लत नहीं हुआ होता तो उसके नाम का इतिहास ही नहीं बनता | उसकी ज़िन्दगी बर्बाद हुई और इतिहास बन गयी | पर ऐसी बहुत सी जिंदगियां हैं जो बर्बाद हैं और गुमनाम हैं |