तुम हमारे घर आते हम तुम्हारे घर आते
ग़र रहते हम दोस्त तो मस्ती से जी पाते
इतनी सारी बंदिशें इश्क़ साथ लाएगा
ऐसी ग़ुलामी में बोलो कब तक जी पाते
न भटकना पड़ता यूं दूसरों के दर पर
खुद से इश्क़ करने का ग़र हुनर जान पाते
एक सिरा खुद लेकर दूसरा तुम्हें थमाया था
जितनी बार तुमने गिराया काश उतनी बार उठा पाते
प्यार के गीतों से फिर आँखें नम हुई हैं
तुम्हारे पास आने की छटपटाहट उम्र भर रोक पाते
ओ रहबरों एक बस्ती दिलजलों की बसा देते
भूल अपना "मैं" सब इश्क़ के किस्से सुना पाते
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