Friday, December 20, 2013

मैं रेगिस्तान में मरूँगा

जब लौट कर जाना ऐसा हो जायेगा
जैसा वर्जित होना होता है
जैसे घर हो जाते हैं
माँ वहीँ रहती है
जैसे प्रेमी हो जाते हैं
हर बात पे झगड़े के बाद या  
लम्बी चुप्पी के बाद
अगर तब लौटे ?
कायरता और धैर्य को
एक तराजू में तौला जायेगा क्या ?
प्यार और कमज़ोरी को भी ?
समझ धोखा दे ही देती है
कोई पीछे भागता है
कोई स्थिति से
अगर है कुछ मन में
तो झाँका जाना चाहिए मन में
इतने प्यारे लोग निर्दयी क्या सच में होते हैं ?
अनकही बातों का अपराध-बोध
मुझे भी छीलता है
कसौटी पर मुझे खरा उतरना था
तुम्हें क्यों नहीं ?
तुमने भी किया था
तुम्हें भी मारेगा ...

और मैंने अपने मरने की जगह
चुन ली है
मैं मरूँगा वहाँ जहां
आस होगी
प्यास होगी
रेत होगी
जहां रेगिस्तान होगा
हाँ मैं रेगिस्तान में मरूँगा
सुनो
किसी एक साल तुम्हें झमाझम बरसना होगा

लोग कहते हैं
रेगिस्तान में बारिश नहीं होती |

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