Monday, December 23, 2013

जंगल ख़त्म हो रहे हैं......

कर तो लोगे प्रेम 
निभाओगे कैसे ?
अपने ही पहरेदार बन कर बैठ जायेंगे 
तुम्हें बंद कमरों में पीटा जायेगा 
तुम्हारी ज़ात तय करेगी तुम्हारा भविष्य 
तुम्हारी जेब का भार तय करेगा तुम्हारी इज्ज़त 
तुम्हारे परम-पूज्य पिताश्री-माताश्री 
(मुख्यतः पिताश्री,माताएं अक्सर मूक होती हैं)
तय करेंगे की तमाम उम्र 
हर रात तुम्हें किसके सोना है 
उस कमरे के बाहर भले लोगों का समाज होगा
अंदर
एक जंगल होगा
ऐसे जंगल का तिरस्कार करोगे
तो कानून भी है तुम्हारे लिए
पेड़ की टहनी पर रस्सी का एक सिरा
दूसरा दो गलों में
घुटेगा दम
हवा में निर्जीव होंगे
चार पैर ....
और यह होगा जंगल का इन्साफ ...

समाज पनप रहा है जंगल ख़त्म हो रहे हैं......

No comments:

Post a Comment