Thursday, August 15, 2013

आपको बेवकूफ कहूँगा या अति आशावादी ....

कमाल है यार |लोग बधाइयाँ दे रहे हैं एक दुसरे को |कुछ ख़ास है क्या आज?कहीं तीन रंगों के गुब्बारे लगाये गए हैं,कहीं लोग बहुत मेहनत कर के अपने स्कूलों और संस्थाओं में जश्न कि तैयारी में लगे हैं |यह सब मज़ा-मस्ती तो ठीक है लेकिन आप तो असल में अपनी गुलामी का जश्न मन रहे हैं |जो व्यक्ति प्रेम करने को आज़ाद नहीं है वह प्रेम के गीत गायेगा |जो देश नहीं चला पा रहे वो भाषण देंगे |आप मणिपुर या असम जाइए,कश्मीर जाइए |वह जाकर मत बोल दीजियेगा कि स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक बधाई |छत्तीसगढ़ ही चले जाइए |आप भूल गए होंगे की 16 दिसम्बर को दिल्ली में क्या हुआ था या क्या हो रहा है अभी उन रेपिस्ट्स का ?सोनी सोरी आज़ाद है क्या ?या वह नौजवान जो जेलों में ठूंस दिए जाते हैं यूँही |तेज़ाब की खुले आम बिक्री पर प्रतिबन्ध लग गया है शायद |
                            यहाँ तो हर घर,हर संस्था का अपना अलग संविधान है,अपने कानून हैं,वही मानने पड़ेंगे|कोई कहता है इज्ज़त दिल से आती है |अरे भाई किसकी इज्ज़त ?उत्तराखंड में कितना काम कर दिया सरकार ने ?यह तो बूँद और गूँज जैसी संस्थाएं हैं जो लगातार काम कर रहीं हैं |पर हमें अपनी आँखें तब तक मूँद कर रखनी हैं जब तक हमारे साथ न हो जाए |तब तक आप जश्न मानिए,देश आज़ाद है,आप भी | मैं या तो आपको बेवकूफ कहूँगा या अति आशावादी |....

Tuesday, August 13, 2013

कविताओं में किये ब्रेक-अप

समय बोलता गया कि
तुम्हें उदार होना है
मर जाने की हद तक
हार जाना मर जाने से
बेहतर लगा
जो बोला समय ने बोला
कविताओं में किये ब्रेक-अप
जो निकले थे निरंतर नैराश्य से
जितना दहाड़ना
उतना गिडगिडाना
जितने सपने बुनना
उतने दिन जलाना
एक पग बढ़ना
दो पीछे लौट आना
आसान नहीं था कुछ भी
बार बार जाना
लौट कर आना
एक दिन चले जाने के लिए ......

Sunday, August 04, 2013

तुम्हारी मजबूरियों और मेरे अकेलेपन का सामंजस्य बैठ ही नहीं पाया .....

वो दिन नाकामियों और संघर्षों के दिन थे| संघर्ष के दिन तो खैर जब से होश संभाला तब से रहे|ऐसे ही दिनों में मैंने हिम्मत की अपने मन-मुताबिक जीने की| जो मुझे खाने के लिए पैसे देते थे,पहनने को कपड़े देते थे,बचपन से पढ़ाते-लिखाते रहे,उनके विरूद्ध जाने की| जब जब उन्होंने मुझसे उम्मीद की मैंने कह दिया कि मुझे अपने हिसाब से जीना है| मेरी हर बात को मान लेना उनकी सहमति नहीं थी,मजबूरी थी शायद| यह मन-मुताबिक़ ज़िन्दगी मैंने जैसे ही जीनी शुरू की,तुम आ गयीं और कहा कि तुम्हे प्रेम है मुझसे| हालांकि यह मुझे एक उपलब्धि जैसा लगा कि एक लड़की स्वयं मुझसे कहे कि उसे मुझसे प्रेम है| मैंने समझाया कि मुश्किल होगी,तुमने कहा कि हम मिलकर संभाल लेंगे| ठीक है कह कर मैंने तुम्हे गले लगा लिया| मुझे अनुभूति हुई कि हमारा प्रेम महान है,हम महान हैं | उसके बाद दर्द ,पीड़ा,यातना का सिलसिला शुरू हुआ| फिर भी हम साथ बने रहे|एक दुसरे से और परिस्थितियों से लड़ते रहे |यूं दुखी रहकर साथ बने रहना मेरे अंदर महानता के अहसास को दोगुना कर देता था |और हमें यूं ही जीना था| आत्महत्या को कायरतापूर्ण काम कहा जाता था और और ऐसा ही कहने वाले लोग प्रेम की इजाज़त नहीं देते थे | तुम्हारी मजबूरियों और मेरे अकेलेपन का सामंजस्य बैठ ही नहीं पाया| प्रेम तो हमें अथाह था पर समय अनुकूल नहीं था |
         उन दिनों तुम्हारा गुस्सा माँ पर उतरता था |मुझे चिल्लाना होता था तो माँ होती थी | सब कुछ सुनती थी |और जब मुझसे नाराज़ या गुस्सा हो जाती थी तो तुम्हारी तरह दो दिन या सात दिन का इंतज़ार नहीं करती थी |शायद रो लेती होगी थोड़ी देर अपने इश्वर के सामने और पलट कर फ़ोन करती थी और कहती थी कि परेशान मत हो | थोड़े दिन के लिए घर आजा मन हो तो |वह सब कुछ समझती थी पर मैंने कभी उसे समझने की जरुरत तक नहीं समझी कभी |उसके बारे में कभी ऐसा नहीं लगा कि वो मुझे भूल कर अजनबी हो गयी है |उसके प्रति कभी कोई ज़िम्मेदारी नहीं महसूस हुई,यह या तो मेरी मेरी नीचता थी या उसके प्रेम की ताकत |
                                                         नींद में अचानक तुम्हारी यादों को टटोलना,सड़क पर पैदल चलते समय अपनी हथेली में तुम्हारी हथेली कि सिहरन,अपनी आँखों में तुम्हारे चेहरे को धुंधला होने से बचाने कि ख्वाहिश, सुबह उठते ही महसूस हुए पहले क्षण की बदहवासी....अब यही हो तुम |
अधूरा रहना ही नियति है शायद |