वो दिन
नाकामियों और संघर्षों के दिन थे| संघर्ष के दिन तो खैर जब से होश संभाला तब से
रहे|ऐसे ही दिनों में मैंने हिम्मत की अपने मन-मुताबिक जीने की| जो मुझे खाने के
लिए पैसे देते थे,पहनने को कपड़े देते थे,बचपन से पढ़ाते-लिखाते रहे,उनके विरूद्ध
जाने की| जब जब उन्होंने मुझसे उम्मीद की मैंने कह दिया कि मुझे अपने हिसाब से जीना
है| मेरी हर बात को मान लेना उनकी सहमति नहीं थी,मजबूरी थी शायद| यह मन-मुताबिक़
ज़िन्दगी मैंने जैसे ही जीनी शुरू की,तुम आ गयीं और कहा कि तुम्हे प्रेम है
मुझसे| हालांकि यह मुझे एक उपलब्धि जैसा लगा कि एक लड़की स्वयं मुझसे कहे कि उसे
मुझसे प्रेम है| मैंने समझाया कि मुश्किल होगी,तुमने कहा कि हम मिलकर संभाल
लेंगे| ठीक है कह कर मैंने तुम्हे गले लगा लिया| मुझे अनुभूति हुई कि हमारा प्रेम
महान है,हम महान हैं | उसके बाद दर्द ,पीड़ा,यातना का सिलसिला शुरू हुआ| फिर भी हम साथ
बने रहे|एक दुसरे से और परिस्थितियों से लड़ते रहे |यूं दुखी रहकर साथ बने रहना
मेरे अंदर महानता के अहसास को दोगुना कर देता था |और हमें यूं ही जीना
था| आत्महत्या को कायरतापूर्ण काम कहा जाता था और और ऐसा ही कहने वाले लोग प्रेम की
इजाज़त नहीं देते थे | तुम्हारी मजबूरियों और मेरे अकेलेपन का सामंजस्य बैठ ही नहीं
पाया| प्रेम तो हमें अथाह था पर समय अनुकूल नहीं था |
उन दिनों तुम्हारा गुस्सा माँ पर उतरता
था |मुझे चिल्लाना होता था तो माँ होती थी | सब कुछ सुनती थी |और जब मुझसे नाराज़ या
गुस्सा हो जाती थी तो तुम्हारी तरह दो दिन या सात दिन का इंतज़ार नहीं करती थी |शायद
रो लेती होगी थोड़ी देर अपने इश्वर के सामने और पलट कर फ़ोन करती थी और कहती थी कि परेशान मत हो | थोड़े दिन के लिए घर आजा मन हो तो |वह सब कुछ समझती थी पर मैंने कभी
उसे समझने की जरुरत तक नहीं समझी कभी |उसके बारे में कभी ऐसा नहीं लगा कि वो मुझे
भूल कर अजनबी हो गयी है |उसके प्रति कभी कोई ज़िम्मेदारी नहीं महसूस हुई,यह या तो
मेरी मेरी नीचता थी या उसके प्रेम की ताकत |
नींद में अचानक तुम्हारी यादों को टटोलना,सड़क पर पैदल चलते समय अपनी हथेली
में तुम्हारी हथेली कि सिहरन,अपनी आँखों में तुम्हारे चेहरे को धुंधला होने से
बचाने कि ख्वाहिश, सुबह उठते ही महसूस हुए पहले क्षण की बदहवासी....अब यही हो तुम
|
अधूरा
रहना ही नियति है शायद |
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