धकेल दिया गया था बाहर
उनका हर अट्ठहास मुझे
हिंसक अँधेरे में डुबोता था ।
हिंसक होना महीनों चुप भी कर सकता है
और जब कहा गया कोई तमाशा नहीं
क़सम
नहीं होने दिया तमाशा कोई
सारे तमाशे सिर में लिए फिरता हूँ ।
वे सीख कर आए थे हँसना सारा
उसी दिन के लिए,
मैंने उस दिन सीखा कि
मैं देख सकता था
जाते हुए,
पर छू नहीं,
उसे ही ।