फिर एक समय आता है
जब आप माँग नहीं सकते
दे भी नहीं पाते
तब
सिखाना पड़ता है खुद ही खुद को पालना
लम्बी साँसें भर कर गले में उतारना पड़ता है सारा तेज़ाब
फेँक देना होता है खुद को उदासी वाले किसी देश में
कोई अपनी आँखें
अपनी ममता ले कर
नहीं पहुँच पाए जहाँ तक
सीने से उठते सब शब्द सिर को हौले हौले करते हैं ज़ख्मी ।
काश दिल नाखूनों में होता,रोज़ चबा लिया करता थोड़ा ।
कितना चाहा होगा ना आपने कि साथ रहें
जो चाहा वही तो नहीं मिला बस
बाक़ी तो कितना हँसते हैं हम ।
जब आप माँग नहीं सकते
दे भी नहीं पाते
तब
सिखाना पड़ता है खुद ही खुद को पालना
लम्बी साँसें भर कर गले में उतारना पड़ता है सारा तेज़ाब
फेँक देना होता है खुद को उदासी वाले किसी देश में
कोई अपनी आँखें
अपनी ममता ले कर
नहीं पहुँच पाए जहाँ तक
सीने से उठते सब शब्द सिर को हौले हौले करते हैं ज़ख्मी ।
काश दिल नाखूनों में होता,रोज़ चबा लिया करता थोड़ा ।
कितना चाहा होगा ना आपने कि साथ रहें
जो चाहा वही तो नहीं मिला बस
बाक़ी तो कितना हँसते हैं हम ।
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