Saturday, November 30, 2013

सहमे सहमे फिरते थे दो पंछी दिल्ली की सडकों पे

गहरे हैं ज़ख्म वक़्त तो लगेगा भरने में
जी लिए हैं बहुत अब लम्हा लगेगा मरने में

बेहतर था एक गोली में जान निकल जाती
सदियाँ लगेंगी इस तरह की मौत से उबरने में

सहमे सहमे फिरते थे दो पंछी दिल्ली की सडकों पे
नहीं बनती तो छोड़ो यार क्या रखा है डरने में

हम नहीं हारे हैं जीती है ज़ात इंसान की
कहते तो थे तुमको "वो" क्या रखा है इश्क करने में ...

बच्चे मर गए

ख़त्म हुआ अब
कब तक टालें

ज़हर के प्याले
सब मेरे हवाले

लानत दुनिया
मुझ पे डाले

लाल पड़ गए
सब नदिया-नाले

सब हँस के बोले
जा जी ले साले

बच्चे मर गए
खुश हैं घरवाले 

Tuesday, November 26, 2013

कोई इस जगह का नाम बता दे

तुच्छ मैं था नहीं
चुप था
प्रतीक्षा में
अब मुझे लगता है
मानवता के इतिहास में खुद पर
किया जाने वाला सबसे बड़ा ज़ुल्म है
प्रतीक्षा करना

जब आप हँस सकते थे छोटी-छोटी बातों पर
खेल सकते थे घर के छोटे बच्चों के साथ
बना सकते थे माँ के साथ खाना
कर सकते थे बहुत सारे रचनात्मक कार्य
आप प्रतीक्षा में थे
घूम सकते थे अकेले भी
पहाड़ियों पर,बर्फ में,बारिशों में
जला सकते थे दीपक
लगा सकते थे नए पौधे
आप प्रतीक्षा में थे
बांधे जा सकते थे अकेले भी
मन्नत के धागे
पर एक पागलपन लिए थे

और समाज के आगे होना था
नतमस्तक
वही देता था स्वीकृति

न अंदर जाने की इजाज़त
न मुड़कर जाने की हिम्मत
कब तक और कैसे
खड़ा रहे कोई
खुले दरवाज़े पर
कोई इस जगह का नाम बता दे
जहां खड़ा हूँ मैं
यहाँ से कहाँ जाया जाता है ?