गहरे हैं ज़ख्म वक़्त तो लगेगा भरने में
जी लिए हैं बहुत अब लम्हा लगेगा मरने में
बेहतर था एक गोली में जान निकल जाती
सदियाँ लगेंगी इस तरह की मौत से उबरने में
सहमे सहमे फिरते थे दो पंछी दिल्ली की सडकों पे
नहीं बनती तो छोड़ो यार क्या रखा है डरने में
हम नहीं हारे हैं जीती है ज़ात इंसान की
कहते तो थे तुमको "वो" क्या रखा है इश्क करने में ...
जी लिए हैं बहुत अब लम्हा लगेगा मरने में
बेहतर था एक गोली में जान निकल जाती
सदियाँ लगेंगी इस तरह की मौत से उबरने में
सहमे सहमे फिरते थे दो पंछी दिल्ली की सडकों पे
नहीं बनती तो छोड़ो यार क्या रखा है डरने में
हम नहीं हारे हैं जीती है ज़ात इंसान की
कहते तो थे तुमको "वो" क्या रखा है इश्क करने में ...
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