Saturday, November 30, 2013

सहमे सहमे फिरते थे दो पंछी दिल्ली की सडकों पे

गहरे हैं ज़ख्म वक़्त तो लगेगा भरने में
जी लिए हैं बहुत अब लम्हा लगेगा मरने में

बेहतर था एक गोली में जान निकल जाती
सदियाँ लगेंगी इस तरह की मौत से उबरने में

सहमे सहमे फिरते थे दो पंछी दिल्ली की सडकों पे
नहीं बनती तो छोड़ो यार क्या रखा है डरने में

हम नहीं हारे हैं जीती है ज़ात इंसान की
कहते तो थे तुमको "वो" क्या रखा है इश्क करने में ...

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