Wednesday, May 14, 2014

खुद ग़ैर हूँ ,आज खुद से बचाता हूँ


कभी तुझ को बचाता हूँ,कभी खुद को बचाता हूँ
        जाने कैसे मैँ मेरे अंदर इश्क़ की लौ बचाता हूँ

        मुद्दतों से लुटता ही आया है तेरा शहर
        मैं तो मेरी ढाई साल की दिल्ली बचाता हूँ

        हलक़ पे अटका रहे नाम,ज़ुबाँ पे न आएगा  
        जा मैं तुझे बेवफ़ाई के असर से बचाता हूँ

        तेरी हँसती आँखों ने जान रूलाया है बहुत
        मैं फिर भी तुझे मेरी दुआओं में बचाता हूँ
        
        तुझे ग़ैरों से बचाना फ़र्ज़ था मेरा  
        खुद ग़ैर हूँ ,आज खुद से बचाता हूँ
        

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