बुझती लौ की छटपटाहट से उबरने को …
यह सब ख़ुद को बचाने का एक तरीका है बस। प्रदीप अवस्थी का तरीका । इसे पागलपन भी कहा जा सकता है।
Tuesday, May 13, 2014
साथ
हमें तब तक हंसना था जब तक
ज़बरदस्ती कोशिश करने कर भी
हँसी ख़त्म हो चुकी होती
हमें तब तक रोना था जब तक
आँखों में आँसू और गले का रूँधना
ख़त्म हो चुका होता
इतना तो होना था
साथ |
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