कोई सदियों पुरानी बात तो नहीं
जब तुम अपनी नन्ही उँगलियों में भरा
ख़ालीपन,
निराशा,
ग़ुस्सा,
डर,
आँसूं,
पीड़ा,
प्यार,
पन्नों पर उड़ेल कर
उन्हें ख़त बनाती थी और
दिल्ली की सडकों पर
जगह-जगह मूक खड़े
लाल डब्बों में छोड़ आती थी ।
डाकिया परेशान होगा
वहाँ से यहाँ किसी ने प्यार नहीं भेजा
बहुत समय बीता ।
जब तुम अपनी नन्ही उँगलियों में भरा
ख़ालीपन,
निराशा,
ग़ुस्सा,
डर,
आँसूं,
पीड़ा,
प्यार,
पन्नों पर उड़ेल कर
उन्हें ख़त बनाती थी और
दिल्ली की सडकों पर
जगह-जगह मूक खड़े
लाल डब्बों में छोड़ आती थी ।
डाकिया परेशान होगा
वहाँ से यहाँ किसी ने प्यार नहीं भेजा
बहुत समय बीता ।
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