तुम
जो अंतर्मन में बैठी हो
तुमसे
मैं फुसफुसाकर पूछता हूँ
मैं जाऊँ ?
यथार्थ का बोध है मुझे पर
तुम्हारे लौटने की आस का कोई अंत नहीं जान
तुम
अंतर्मन में जहाँ बैठी हो
वहाँ से
तुम्हारा मौन और
तुम्हारे उस मौन में गढ़ी तुम्हारी आँखें
बेड़ियों में क़स देती हैं मेरे दिल को
कोई आवाज़ लगाता है मुझे !
अपना चेहरा ले कर सामने खड़ी हो जाती हो
हटो !
हटो भी !
मुझे इन आँखों में कोई और चेहरा बसाना है ।
जो अंतर्मन में बैठी हो
तुमसे
मैं फुसफुसाकर पूछता हूँ
मैं जाऊँ ?
यथार्थ का बोध है मुझे पर
तुम्हारे लौटने की आस का कोई अंत नहीं जान
तुम
अंतर्मन में जहाँ बैठी हो
वहाँ से
तुम्हारा मौन और
तुम्हारे उस मौन में गढ़ी तुम्हारी आँखें
बेड़ियों में क़स देती हैं मेरे दिल को
कोई आवाज़ लगाता है मुझे !
अपना चेहरा ले कर सामने खड़ी हो जाती हो
हटो !
हटो भी !
मुझे इन आँखों में कोई और चेहरा बसाना है ।
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