Wednesday, April 08, 2015

यहाँ रख छोड़ा है मैंने तुम्हें

मिट्टी,
पानी,
आकाश,
रौशनी का गोला,
मेरी दृष्टि 
और साँझ । 

तुम्हें पता है ?
यहाँ रख छोड़ा है मैंने तुम्हें 
यहीं मिलता हूँ रोज़ तुमसे । 
कोई बताए !

बहुत दूर जाना पड़ता है तुमसे मिलने 
इसी में सारा दिन मेरा निकला जाता है । 

और 
यह गोला पानी में डूबकर 
दूसरी दुनिया में चला जाता है 
जैसे तुम चली गई हो 
दूसरी दुनिया में 
सारी रौशनी ले कर । 

मेरी आँखों को अँधेरा नहीं सुहाता । 

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