मिट्टी,
पानी,
आकाश,
रौशनी का गोला,
मेरी दृष्टि
और साँझ ।
तुम्हें पता है ?
यहाँ रख छोड़ा है मैंने तुम्हें
यहीं मिलता हूँ रोज़ तुमसे ।
कोई बताए !
बहुत दूर जाना पड़ता है तुमसे मिलने
इसी में सारा दिन मेरा निकला जाता है ।
और
यह गोला पानी में डूबकर
दूसरी दुनिया में चला जाता है
जैसे तुम चली गई हो
दूसरी दुनिया में
सारी रौशनी ले कर ।
मेरी आँखों को अँधेरा नहीं सुहाता ।
पानी,
आकाश,
रौशनी का गोला,
मेरी दृष्टि
और साँझ ।
तुम्हें पता है ?
यहाँ रख छोड़ा है मैंने तुम्हें
यहीं मिलता हूँ रोज़ तुमसे ।
कोई बताए !
बहुत दूर जाना पड़ता है तुमसे मिलने
इसी में सारा दिन मेरा निकला जाता है ।
और
यह गोला पानी में डूबकर
दूसरी दुनिया में चला जाता है
जैसे तुम चली गई हो
दूसरी दुनिया में
सारी रौशनी ले कर ।
मेरी आँखों को अँधेरा नहीं सुहाता ।
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