Sunday, April 12, 2015

फिर कभी नहीं लौटे

हॉफलौंग की पहाड़ियाँ हमेशा याद रहेंगी मुझे । 

वॉलन्टरी रिटायरमेंट ले कर कोई लौटता है घर 
बीच में रास्ता खा जाता है उसे । 
दुःख ख़बर बन कर आता है 
एक पूरी रात बीतती है छटपटाते 
सुध-बुध बटोरते । 

अनगिनत रास्ते लील गए हैं सैकड़ों जानें । 

एक-दूसरे से अपना दुःख कभी ना कह सकने वाले अपने 
कैसे रो पाते होंगे फूट-फूट कर । 

असम में लोग ख़ुश नहीं है,
बहुत सारी प्रजातियाँ अपनी आज़ादी के लिए लड़ रहीं हैं 
उनके लिए कोई और रास्ता नहीं छोड़ा गया है शायद । 
हथियार उठाना मजबूरी ही होती है यक़ीन मानिए 
कोई मौत लपेट कर चलने को यूँ ही तैयार नहीं हो जाता । 

आप देश की बात करते हैं,
युद्ध की बात करते हैं,
देश तो लोग ही हैं ना !
उनके मरने से कैसे बचता है देश ?

बॉर्डर पर,कश्मीर में,बंगाल में,छतीसगढ़ में,उड़ीसा में,असम में 
मरते हैं पिता,
उजड़ते हैं घर,
बचते हैं देश । 

अख़बारों में कितनी ग़लत ख़बरें छपती हैं,यह तभी समझ आया । 

सामान लौटता है !
गोलियों से छिदा हुआ खाने का टिफ़िन,
रुका हुआ समय दिखाती एक दीवार घड़ी,
बचपन से खबरें सुनाता रेडियो,
खरोंचों वाली कलाई-घड़ी,
ख़ून में भीगी मिठाईयाँ,
लाल हो चुके नोट,
वीरता के तमगे 
और धोखा देती स्मृति । 

कितनी बार आप लौट आए 
वो मेरी नींद होती थी या सपना या कुछ और 
जब चौखट बजती थी और आप टूटी-फूटी हालत में आते थे 
फिर कुछ दिन में चंगे हो जाते थे 
ऐसा मैंने कुछ सालों तक देखा 
अब वो साल तक नहीं लौटते । 

हर बार सोचा कि 
इस बार जब आप आएँगे सपने में 
तो दबोच लूँगा आपको 
सुबह उठकर सबको बोलूँगा कि देखो 
लौट आए पापा 
मैं ले आया हूँ इन्हें उस दुनिया से 
जहाँ का सब दावा करते हैं कि नहीं लौटता कोई वहाँ से,
ऐसी सोची गई हर सुबह मिथ्या साबित हुई । 

काश फिर आए ऐसा कोई सपना 
फिर मिल पाए वही ऊर्जा 
एक घर को 
जो पिता के होने से होती है । 

हे ईश्वर ! 
कोई कैसे यह समझ पैदा करे कि बिना झिझके सीख पाए कहना 
"पिता नहीं है" । 

और कितनी भी क़समें खाते जाएँ हम 
कि नहीं आने देंगे किसी भी और का ज़िक़्र यहाँ 
पर एक समय था,एक शहर था बुद्ध का,एक साथ था, 
फल्गु नदी बहती थी,
विष्णुपद मंदिर में पूर्वजों को दिलाई जाती थी मुक्ति । 
हम यहाँ दोबारा आएँगे और करेंगे पिण्ड-दान 
ऐसा कहती,भविष्य की योजनाएँ बनाती एक लड़की 
जा बैठी है अतीत में कहीं । 

आख़िरी स्मृतियों में बचती है रेल,
प्लेटफॉर्म पर हाथ हिलाते हुए पीछे छूट जाना । 
उस आख़िरी साथ में पहली बार उन्होंने बताए थे अपने सपने । 

सात साल पहले इसी दिन वे लौटे 
हमने उन्हें जला दिया । 
फिर कभी नहीं लौटे 
पिता । 






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