Friday, April 10, 2015

मैं उम्मीदों के आँसू उछालता हूँ और.........

शाम के सात बजे हैं । मैं अभी सो कर उठा हूँ । मुझे याद है,जब मुझे नींद आ रही थी तब मैं परेशान था । डरियेगा मत । आत्महत्या वाला परेशान नहीं । अभी सो कर उठा हूँ तो लगता है जैसे किसी भूलभुलैया में हूँ । उठता हूँ तो कभी लगता है बचपन में उठा हूँ,कभी घर में और कभी दिल्ली में । उठते ही बदहवास-सा जाने क्या खोजता हूँ । घर की चौथी मंज़िल से मुंबई शहर डरावना दिख रहा है । मैं अगर ख़ुश होता तो लिखता कि घर की चौथी मंज़िल से मुंबई शहर बहुत ख़ूबसूरत दिख रहा है । पर मैं दुखी तो नहीं हूँ । 

                                             दूर-दूर तक लाल-पीली रोशनियाँ दिखाई दे रहीं हैं । बंद खिड़की से बाहर दिखती गाड़ियाँ  बिना आवाज़ के सरपट दौड़ रही हैं । रोशनी से याद आया जिसे मैं अपने जीवन की रोशनी समझता था वह पिछले साल इन्हीं दिनों मुझसे किनारा कर गई । नीचे छोटे बच्चे खेल रहे हैं । कुछ लोग बातें कर रहे हैं और खूब हँस रहे हैं । एक लम्बी सड़क दिखती है जिस पर गाड़ियाँ दौड़ रही हैं । सब इधर-उधर भागे जा रहे हैं । कोलाहल-सा है । मैं ठीक-ठीक अंदाज़ा नहीं लगा पा रहा हूँ कि मुझे क्या दुःख है । मायूसी क्यों बैठी जा रही है अंदर । देखा जाए तो अपने देश के पिचयान्वे प्रतिशत लोगों से अच्छा जीवन बिता रहा हूँ । 

                                                                               यह शहर पागलों का शहर लगता है । सब को बहुत जल्दी अमीर बनना है,मशहूर होना है। बुलबुले सा शहर है जैसे अभी सब होश में आ जाएँगे और बहुत रोएँगे कि क्या कर रहे हैं अपनी ज़िन्दगी के साथ । गुब्बारे से इस शहर में कोई हल्के से सुई चुभा दे या कोई ग़ुस्से में हो तो फोड़ ही दे । जैसे एक भले दिन सब फूट जाएगा और असली,नया और धुला हुआ शहर बाहर आएगा । 

                                                                  बेपरवाही सारी गुम हो गई है । जब नकली बन कर मिलता हूँ तो सब पसंद करते हैं ।जब बिलकुल खुद जैसा होता हूँ तो कोई पूछता तक नहीं । ऐसे ही तो,लोग आपको नकली बनने पर मजबूर करते हैं और नकली लोगों के लिए,नकली ख़ुशी की तलाश में हम नकली होते चले जाते हैं । 

                                  वह जब से छोड़ कर गई है,किसी के भी क़रीब जाने में डर लगता है । अपनी परेशानियों का बोझ किसी और पर क्यों लादा जाए ।क्यों अपना अँधेरा किसी के दिमाग़ में भरूँ । अपने बारे में बात करने को वैसे भी कोई नहीं मिलता । मैं उम्मीदों के आँसू उछालता हूँ और थोड़ा और मायूस होता जाता हूँ । 

                     नींद में काँटे उग आए हैं । अभी सोते समय एक दोस्त का फ़ोन आया था,मैं फ़ोन साइलेंट पर कर के फिर सो गया । मुझे और पैसे कमाने हैं । कुछ अच्छा पढ़ने को मिलता ही नहीं । पता नहीं लोग क्या-क्या लिख रहे हैं । बाहर कितनी अच्छी फ़िल्में बनती हैं । यहाँ तो कोई अच्छा काम करने की कोशिश भी करता है तो आस पास वाले ही टाँग खींचने में लगे रहते हैं । 

गुरमीत राम रहीम सिंह के गाने आते हैं,फिल्म आती है । आनंद पटवर्धन जीवन भर फ़िल्में बनाते हैं और कितने लोग जानते हैं । अपराधियों को चुन कर संसद भेज दिया जाता है । वह कैसे लोग होंगे जिन्हें हिंसा से सुक़ून मिलता है। वो कैसी पढ़ी-लिखी नौकरी करती लड़कियाँ होंगी जो शादी के बाद अपना नाम बदल लेती हैं । मेरा तो बचपन से एक नाम है और मैं तो उसे किसी के लिए ना बदलूँ । मुझे कब से गिटार सीखना है । कितना काहिल हूँ मैं । दिल्ली जाने का मन भी करता है और डरता भी हूँ । उससे सामना कभी हुआ तो क्या होगा । जिसके थोड़ा क़रीब जाता हूँ उसी के प्रति मन में कटुता आ जाती है । मैं और लोगों को नहीं जानना चाहता । सब दूर से ही अच्छे लगते हैं । इतना सारा काम रहता है करने को,मैं सोता क्यों हूँ । 

                                    सब कुछ फिसलता हुआ सा लगता है । कितना मन करता है किसी से बात करने का । यहाँ समुन्दर है । मेरे कभी काम नहीं आया । मैं इंतज़ार ही करता रह गया । माँ के साथ वक़्त बिताना है । भतीजों को बड़ा होते देखना है । कितना कुछ सीखना है । बहुत समय ख़राब किया मैंने । लोगों में करुणा ख़त्म होती जा रही है । दूसरोँ के जीवन में होने वाले तमाशे हमें सुख देते हैं । मुझे रात में ठीक समय पर सोना शुरू करना है । सारा दुःख अपनों से ही मिलता है । पुरुषों के अंदर इतना ग़ुस्सा क्यों भरा है । जिनके सुर नहीं लगते,उनके गाने आते हैं और हिट हो जाते हैं । मैंने बहुत पहले इस दुनिया के बनाए मानकों पर खरा उतरना छोड़ दिया है । किसी भी संस्था में पाँच लोग बैठ कर बच्चों का भविष्य तय कर रहे  होते हैं ।   

                                                                कुछ नया बनाने के लिए पुराना सब तोड़ना पड़ता है या कहूँ छोड़ना पड़ता है । पर पुराना छूटे ही नहीं तो । जब ग़ुस्सा आए तो क्या करना चाहिए । आप जिनको जितना महत्व देते हैं,उनके लिए आप उतने ज़रूरी ना रह जाएँ तो क्या करना चाहिए । 

                                                                                              रात में कभी भी नींद खुलती है तो खिड़की से, अँधेरे में दूर तक दुःख साफ़ नज़र आता है । बेचैनी होती है । पीछे ही रह गया सब ।घर,माँ,पिता,दिल्ली,प्यार । मैं कहाँ आगे जा रहा हूँ । कितना कुछ बस छूटता जाता है । पीछे मुड़ कर देखूँ तो सारे पुल ख़ुद ही तो ध्वस्त किए हैं ।जब उनके सामने हँस रहा होता हूँ,तब आँखों में रखे काँटे और अंदर तक धँसते हैं। वे कहते हैं ख़ुद को मार कर क्यों जीते हो । 

यह शहर ऐसा क्या देगा हमें जो हम सब कुछ छोड़ कर पागल हुए पड़े हैं ।  
              

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