Friday, April 17, 2015

ख़ून बहता है माँ ! लिखने दे !

उसकी आँखों में बसा 
मेरे अक्स का आईना
टूटा जिस रात,
समुन्दर पार
मेरी आँख में किरकिरी सी मची 
मसला आँखों को तो लाल रँग गिरा सफ़ेद बेसिन पर 
एक आवाज़ ने बाँधे रखा मुझे सदियों तक । 

मैं लौटा तो सिर्फ़ 
लौटा दिए जाने के लिए 
मेरे इंतज़ार को उन्होंने साना अपनी 
उत्तेजक सिसकियों में । 

फिर जो सब तबाह हुआ तो सबने देखा और हँसे देर तक !

ख़ून बहता है माँ 
लिखने दे !

मैंने अपनी मृत्यु को कविताओं के ज़रिए मारा है ।  

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