Saturday, February 28, 2015

देर तक मेरा फड़फड़ाना ज़िंदा रहे

मैं उड़ना सीखूंगा जब 
तुम मेरे पंखों को बाँध देना । 

जैसे लड़खड़ाता था तुम्हारे पास आते आते 
तुमसे दूर जाते हुए भी वैसे ही लड़खड़ाता हूँ 
और मेरी चलने की चाह ख़त्म होती जाती है ।  

किसी युद्ध में जैसे एक छोटा सा बच्चा 
अपनी जान बचाने को बदहवास दौड़ता रहे 
और छुपने की जगह मिलने पर 
बैठ कर रो पाए चैन से 
ऐसे 
गोद नसीब हो तुम्हारी 
बच्चे को मार जाए गोली कोई । 

और जब मैं मासूम कबूतर हो जाऊँ 
तुम्हारे घर की खिड़की के एक कोने में 
बनाऊँ एक घर । 

मेरी उड़ने की मंशा और बंधे पंखों के बीच 
देर तक मेरा फड़फड़ाना ज़िंदा रहे । 


No comments:

Post a Comment