Friday, February 20, 2015

एक मनहूस दिन में हँसते हुए बेचोगी मेरा आत्मसम्मान

मुझे दो दृश्य याद आते हैं 

किसी गाँव में कहीं तुम जीने पर खड़ी हो 
मूँह फुलाए ग़ुस्से में,
मैं कहीं बाहर से इंतज़ार में हूँ 

फिर एक छत है 
हम घुट रहे हैं 
और बेशर्म चाँद की रौशनी में 
पैदा कर रहे हैं आग । 

झुलसाएगी बहुत गर पैदा हुई आग 
तुम्हारी आँखों में जला देगी मेरा चेहरा 
पहचानने से करोगी इंकार 
मैं चुनूँगा प्यार 
एक मनहूस दिन में हँसते हुए बेचोगी मेरा आत्मसम्मान । 

हम जब अपना पागल होना बचा रहे थे माँ 
एक लड़की बार-बार दिमाग़ पे चोट कर के चली जाती थी । 

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