मुझे दो दृश्य याद आते हैं
किसी गाँव में कहीं तुम जीने पर खड़ी हो
मूँह फुलाए ग़ुस्से में,
मैं कहीं बाहर से इंतज़ार में हूँ
फिर एक छत है
हम घुट रहे हैं
और बेशर्म चाँद की रौशनी में
पैदा कर रहे हैं आग ।
झुलसाएगी बहुत गर पैदा हुई आग
तुम्हारी आँखों में जला देगी मेरा चेहरा
पहचानने से करोगी इंकार
मैं चुनूँगा प्यार
एक मनहूस दिन में हँसते हुए बेचोगी मेरा आत्मसम्मान ।
हम जब अपना पागल होना बचा रहे थे माँ
एक लड़की बार-बार दिमाग़ पे चोट कर के चली जाती थी ।
किसी गाँव में कहीं तुम जीने पर खड़ी हो
मूँह फुलाए ग़ुस्से में,
मैं कहीं बाहर से इंतज़ार में हूँ
फिर एक छत है
हम घुट रहे हैं
और बेशर्म चाँद की रौशनी में
पैदा कर रहे हैं आग ।
झुलसाएगी बहुत गर पैदा हुई आग
तुम्हारी आँखों में जला देगी मेरा चेहरा
पहचानने से करोगी इंकार
मैं चुनूँगा प्यार
एक मनहूस दिन में हँसते हुए बेचोगी मेरा आत्मसम्मान ।
हम जब अपना पागल होना बचा रहे थे माँ
एक लड़की बार-बार दिमाग़ पे चोट कर के चली जाती थी ।
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