Friday, June 22, 2012

सोचने की बात है ....


घर 
गली 
चौराहे 
सरहद 
लोग मर रहे हैं 
किस को महसूस होता है 
एक संसद है 
बहुत सारे नेता हैं 
उन्हें तो 
पता भी नहीं चलता 
या 
पता करना नहीं चाहते ? 
या 
सब पता होता है ?
हंसी मज़ाक करते हैं 
नोट दिखाते हैं 
जूते भी 
फिर दोस्त बन जाते हैं 
जवाब तक नहीं देते 
गुस्सा आता है 
पर गुस्से से काम नहीं बनता 
तब कैसे बनता है ?
सोचने की बात है 
क्या हो रहा है ?

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