Tuesday, February 04, 2014

वो मेरे सामने बैठी मुस्कुरा रही थी

जब बातें शुरू होने से पहले
ख़त्म होने लगी थीं
और सब कुछ भूल कर
लड़खड़ाते हाथों से भी लिखना था
कैसा होता है नकली होते चले जाना
कैसा होता होगा असली रूप में लौटना
और हर निर्णय मजबूरी रहा हो |

“उम्मीद” जितना घातक शब्द है
उतना ही सुंदर भी
और अगर याचना ही अंत है
तो तुमसे क्यों नहीं ?
मेरे पेट में ख़ंजर भोंका गया था
और मैं समझने की कोशिश में था
मुझे लाल रंग नहीं दिखा
आईना दिखा और दो चेहरे
मेरी आँखें बुझती गयीं
चेहरे चूमते रहे एक दूसरे को
इन चेहरों में झुर्रियां पड़नी थीं साथ-साथ
और हमें अतीत में भी जाना था
वही ख़ंजर पलट के मार देना था
पर मैं समझने की कोशिश में था
और वो मेरे सामने बैठी मुस्कुरा रही थी |

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