Sunday, January 18, 2015

मैं दर्द का पुलिंदा हूँ

तुम दरअसल जहाँ-जहाँ 
अपनी ख़ुशी ढूँढने निकलते हो 
वहाँ से हो कर लौटा हूँ कई दफ़े 
चुन लाया हूँ दुःख के कोहिनूर । 

माँ ने हाथ में थमाई थी एक गुल्लक बचपन में 
खनखनाते सिक्कों की आवाज़ 
तब्दील होती गई ख़ालीपन के शोर में । 

गुल्लक बचपन 
जवानी अलमारी 
नींद एक लड़की । 

सारा दुःख समेट लेती है और रोती भी नहीं 
गुल्लक,खनखनाती भी नहीं।

तुम कभी आओ और देखो 
छुओ नहीं 
मैं दर्द का पुलिंदा हूँ 
छुओगे तो पछताओगे ।  

1 comment:

  1. अगर एक किताब आप प्रकाशित करें और उसमें सिर्फ एक ही कविता हो तो बता दीजियेगा।
    मैं कई प्रतियाँ लूँगा। अपनी आर्थिक सामर्थ्य के अनुसार।

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