Sunday, January 18, 2015

कितना भिगो दिया है तुमने अपने स्त्रित्व से

एक कमी है 
बहुत चुभती है 
नहीं ! तुम्हारी नहीं !
तुम तो हो और रहोगी । 

जो जब होता है
जितना होता है,तब ही 
उसे उतना महसूस लेते 
बाद में इतना क्यों रब्बा !

इतने ज़रा से समय में जो दे गई हो 
वो रोज़ थोड़ा-थोड़ा कर के और बढ़ता जाता है । 
तुम्हें बता पाता 
कितना भिगो दिया है तुमने अपने स्त्रित्व से । 

कहीं किसी टूटी या उलझी डोर का कोई सिरा फिर मिलेगा 
और गुंध जाऊँगा उसमें 
तुम्हें साथ ले कर ।

और ऐसा सब कहते हुए आँख से एक भी आँसू नहीं गिरता पगली 
सच 
क़सम से,
तेरी याद भी नहीं आती 
हँसते हुए कहता हूँ ।  


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