एक कमी है
बहुत चुभती है
नहीं ! तुम्हारी नहीं !
तुम तो हो और रहोगी ।
जो जब होता है
जितना होता है,तब ही
उसे उतना महसूस लेते
बाद में इतना क्यों रब्बा !
इतने ज़रा से समय में जो दे गई हो
वो रोज़ थोड़ा-थोड़ा कर के और बढ़ता जाता है ।
तुम्हें बता पाता
कितना भिगो दिया है तुमने अपने स्त्रित्व से ।
कहीं किसी टूटी या उलझी डोर का कोई सिरा फिर मिलेगा
और गुंध जाऊँगा उसमें
तुम्हें साथ ले कर ।
और ऐसा सब कहते हुए आँख से एक भी आँसू नहीं गिरता पगली
सच
क़सम से,
तेरी याद भी नहीं आती
हँसते हुए कहता हूँ ।
बहुत चुभती है
नहीं ! तुम्हारी नहीं !
तुम तो हो और रहोगी ।
जो जब होता है
जितना होता है,तब ही
उसे उतना महसूस लेते
बाद में इतना क्यों रब्बा !
इतने ज़रा से समय में जो दे गई हो
वो रोज़ थोड़ा-थोड़ा कर के और बढ़ता जाता है ।
तुम्हें बता पाता
कितना भिगो दिया है तुमने अपने स्त्रित्व से ।
कहीं किसी टूटी या उलझी डोर का कोई सिरा फिर मिलेगा
और गुंध जाऊँगा उसमें
तुम्हें साथ ले कर ।
और ऐसा सब कहते हुए आँख से एक भी आँसू नहीं गिरता पगली
सच
क़सम से,
तेरी याद भी नहीं आती
हँसते हुए कहता हूँ ।
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