Saturday, January 17, 2015

जिसे मैं धोखा कहता हूँ वो धोखा नहीं

वो नहीं जानता था ऐसा कोई भी शब्द 

प्रेम जो दिख नहीं सकता 
उसे कैसे चीरा जा सकता है 
दो भागों में 
कि लो 
तुम्हारा तुम्हारे हिस्से 
मेरा मेरे हिस्से 
इतने अरसे में हम कोई घुल थोड़े ही गए थे,
समाए कब थे एक-दूसरे में !
ना । 

जो प्रेम सिखाए,वही उसके मायने ठुकराए रोज़ 
क्या क़िस्मत !

जिसे मैं धोखा कहता हूँ वो धोखा नहीं 
ऐसा तो तब फूटता है मूँह से जब आत्मा कलपती है 
मेरे लिए मौत भली 
उसका तो सही था । 

जो दुनिया भर का सारा प्यार समेट कर चूमे घंटों बेतहाशा 
अपमानित भी करे तो क्या कलेजा मेरा जो बिखर जाऊँ । 

क्या अब भी मैं स्त्री के प्रेम को तरसूँगा 
देह के लिए तरसना क्या प्रेम नहीं होता 
अंगारे बरसेंगे 
धुलेगी आत्मा फिर । 

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