वो नहीं जानता था ऐसा कोई भी शब्द
प्रेम जो दिख नहीं सकता
उसे कैसे चीरा जा सकता है
दो भागों में
कि लो
तुम्हारा तुम्हारे हिस्से
मेरा मेरे हिस्से
इतने अरसे में हम कोई घुल थोड़े ही गए थे,
समाए कब थे एक-दूसरे में !
ना ।
जो प्रेम सिखाए,वही उसके मायने ठुकराए रोज़
क्या क़िस्मत !
जिसे मैं धोखा कहता हूँ वो धोखा नहीं
ऐसा तो तब फूटता है मूँह से जब आत्मा कलपती है
मेरे लिए मौत भली
उसका तो सही था ।
जो दुनिया भर का सारा प्यार समेट कर चूमे घंटों बेतहाशा
अपमानित भी करे तो क्या कलेजा मेरा जो बिखर जाऊँ ।
क्या अब भी मैं स्त्री के प्रेम को तरसूँगा
देह के लिए तरसना क्या प्रेम नहीं होता
अंगारे बरसेंगे
धुलेगी आत्मा फिर ।
प्रेम जो दिख नहीं सकता
उसे कैसे चीरा जा सकता है
दो भागों में
कि लो
तुम्हारा तुम्हारे हिस्से
मेरा मेरे हिस्से
इतने अरसे में हम कोई घुल थोड़े ही गए थे,
समाए कब थे एक-दूसरे में !
ना ।
जो प्रेम सिखाए,वही उसके मायने ठुकराए रोज़
क्या क़िस्मत !
जिसे मैं धोखा कहता हूँ वो धोखा नहीं
ऐसा तो तब फूटता है मूँह से जब आत्मा कलपती है
मेरे लिए मौत भली
उसका तो सही था ।
जो दुनिया भर का सारा प्यार समेट कर चूमे घंटों बेतहाशा
अपमानित भी करे तो क्या कलेजा मेरा जो बिखर जाऊँ ।
क्या अब भी मैं स्त्री के प्रेम को तरसूँगा
देह के लिए तरसना क्या प्रेम नहीं होता
अंगारे बरसेंगे
धुलेगी आत्मा फिर ।
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