Saturday, January 10, 2015

रुकते-रुकते फूट पड़ती थी हँसी

खिलौने थे हम अगर 
खेल था वह हमारा 

अदृश्य चाभी को पकड़े हुए सी मुद्रा में मेरी हथेली 
घूमती थी ठीक उसके होंठों के आगे 
और एक शर्त लगती थी कि नहीं हँसेगी वो 

रुकते-रुकते फूट पड़ती थी हँसी । 

यह कुछ ऐसा था कि बस 
मैं था ही नहीं उससे पहले 
मैं होऊँगा भी नहीं उसके बाद 
संसार भर की टिक-टिक रुकनी थी तो वहीं 

रात तुम्हें हँसते हुए देखा था 
सुबह से उधेड़बून में हूँ कि 
उकेर पाऊँ तुम्हारी हँसी से 
मिलने वाला सुक़ून । 

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