कितना कुछ ढूँढा जा रहा है
इधर से उधर भागते फिरते हैं लोग
पहुँचते हैं,
ऊबते हैं,
लौट आते हैं ।
नहीं पहुँचता कहीं तो बस मन !
इसने सिर्फ़ लौटना सीखा है ।
हर कोई ऐसे जूझता है अकेलेपन से जैसे
खुद को ही शत्रु बना कर खड़ा कर लिया हो सामने
और लड़ता रहे दिमाग़ के फट जाने तक
खुद में कुछ नहीं मिलता तो बाहर जाना पड़ता है
बाहर कुछ नहीं मिलता तो लौटना पड़ता है
खुद से लेकिन कैसे लौटा जाए !
चुप्पी में छिपे होते हैं सबसे असरदार शब्द
उन्हें समझ लेने वाले ही हैं सबसे निर्दयी लोग
वे जान चुके हैं हमें पूरा और फिर भूल भी चुके हैं
वे कर सकते हैं लेकिन कुछ नहीं करते बचाने के लिए ।
वे भी शायद इसी खेल में फँसे हैं
वे भी सीखना चाहते होंगे खुद से लौटना ।
हम ढूँढ लाते हैं मायूसी
उन्हीं के प्रति पालते हैं कटुता जो पूछते हैं हमें
खुद से करते हैं नफ़रत ऐसा करने के लिए
चुप रहते हैं घंटों
सीख लेते हैं अभिनय
चढ़ा लेते हैं ऐसी हँसी जो सबसे मुश्किल से हँसी जाती है
फिर सब कुछ भूल कर घुल जाते हैं उन्हीं में एक बच्चे की तरह
कोसते हैं खुद को कि क्यों हैं हम ऐसे ।
जहाँ से मिल सकता था सबसे ज़्यादा प्यार,वहाँ थोड़ा भी दे न पाए ।
इधर से उधर भागते फिर रहे हैं लोग
ज़रा से सुकून के लिए।
कोलाहल है
यह शहर फूटेगा एक दिन ।
इधर से उधर भागते फिरते हैं लोग
पहुँचते हैं,
ऊबते हैं,
लौट आते हैं ।
नहीं पहुँचता कहीं तो बस मन !
इसने सिर्फ़ लौटना सीखा है ।
हर कोई ऐसे जूझता है अकेलेपन से जैसे
खुद को ही शत्रु बना कर खड़ा कर लिया हो सामने
और लड़ता रहे दिमाग़ के फट जाने तक
खुद में कुछ नहीं मिलता तो बाहर जाना पड़ता है
बाहर कुछ नहीं मिलता तो लौटना पड़ता है
खुद से लेकिन कैसे लौटा जाए !
चुप्पी में छिपे होते हैं सबसे असरदार शब्द
उन्हें समझ लेने वाले ही हैं सबसे निर्दयी लोग
वे जान चुके हैं हमें पूरा और फिर भूल भी चुके हैं
वे कर सकते हैं लेकिन कुछ नहीं करते बचाने के लिए ।
वे भी शायद इसी खेल में फँसे हैं
वे भी सीखना चाहते होंगे खुद से लौटना ।
हम ढूँढ लाते हैं मायूसी
उन्हीं के प्रति पालते हैं कटुता जो पूछते हैं हमें
खुद से करते हैं नफ़रत ऐसा करने के लिए
चुप रहते हैं घंटों
सीख लेते हैं अभिनय
चढ़ा लेते हैं ऐसी हँसी जो सबसे मुश्किल से हँसी जाती है
फिर सब कुछ भूल कर घुल जाते हैं उन्हीं में एक बच्चे की तरह
कोसते हैं खुद को कि क्यों हैं हम ऐसे ।
जहाँ से मिल सकता था सबसे ज़्यादा प्यार,वहाँ थोड़ा भी दे न पाए ।
इधर से उधर भागते फिर रहे हैं लोग
ज़रा से सुकून के लिए।
कोलाहल है
यह शहर फूटेगा एक दिन ।
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