Monday, January 12, 2015

मत थामो हाथ,मत लगाओ गले

सर्दियाँ जहाँ बर्फ़ थीं 
अँगीठी की आँच में सपने पकाए थे । 

सूरज उबलता था जब 
लम्बी दोपहरों की उबासियाँ टूटती थीं 
देहों में । 

पतझड़ में हुआ करती थी बारिश 
ऐसा सावन । 

याद है !

पृथ्वी सन्न पड़ी है जब से 
चुप्पी तुमने साधी है । 

तुतला कर बोलो 
रो कर बोलो 
हँस कर बोलो 
छू कर बोलो 
"हुँह कर बोलो"
मीठा बोलो,कड़वा बोलो 
कुछ सुन लो,कुछ कह लो 
डूबते हैं हम,बह लो 
पिस जाएगा,रिस जाएगा 
दर्द है थोड़ा सह लो । 

हम मात खाते-खाते 
पनाह माँगते जाते । 

मत थामो हाथ,मत लगाओ गले । 

मैं कुछ कहूँ तो 
एक बार और हँस दो बस 
मैं जी लूँ एक साल और । 

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