तुम दरअसल जहाँ-जहाँ
अपनी ख़ुशी ढूँढने निकलते हो
वहाँ से हो कर लौटा हूँ कई दफ़े
चुन लाया हूँ दुःख के कोहिनूर ।
माँ ने हाथ में थमाई थी एक गुल्लक बचपन में
खनखनाते सिक्कों की आवाज़
तब्दील होती गई ख़ालीपन के शोर में ।
गुल्लक बचपन
जवानी अलमारी
नींद एक लड़की ।
सारा दुःख समेट लेती है और रोती भी नहीं
गुल्लक,खनखनाती भी नहीं।
तुम कभी आओ और देखो
छुओ नहीं
मैं दर्द का पुलिंदा हूँ
छुओगे तो पछताओगे ।
अपनी ख़ुशी ढूँढने निकलते हो
वहाँ से हो कर लौटा हूँ कई दफ़े
चुन लाया हूँ दुःख के कोहिनूर ।
माँ ने हाथ में थमाई थी एक गुल्लक बचपन में
खनखनाते सिक्कों की आवाज़
तब्दील होती गई ख़ालीपन के शोर में ।
गुल्लक बचपन
जवानी अलमारी
नींद एक लड़की ।
सारा दुःख समेट लेती है और रोती भी नहीं
गुल्लक,खनखनाती भी नहीं।
तुम कभी आओ और देखो
छुओ नहीं
मैं दर्द का पुलिंदा हूँ
छुओगे तो पछताओगे ।
अगर एक किताब आप प्रकाशित करें और उसमें सिर्फ एक ही कविता हो तो बता दीजियेगा।
ReplyDeleteमैं कई प्रतियाँ लूँगा। अपनी आर्थिक सामर्थ्य के अनुसार।